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Monday, 28 July 2014

बाबू शिवचरन प्रधान

बाबू शिवचरन प्रधान




पूरे इलाके के गाँवों में बस एक ही आदमी था जिसके नाम के सामने लोग बाबू लगाते और पीछे प्रधान । बाबू यों अक्सर पढ़े-लिखे लोगों के नाम के सामने लगाया जाता है । शिवरचर जितने पढ़े थे उतने गाँव में बहुत लोग पढ़े होंगे । उनकी ही पीढ़ी में नहीं, उनसे पहले की पीढ़ी में भी । दो-चार जमात पढ़ना भी कोई पढ़ना हुआ । वैसे भी उन्होंने अपनी साक्षरता का कोई ऐसा सबूत कभी दिया नहीं कि बाबू शब्द सार्थक हो ।
लेकिन बाबू थे तो बस थे । वैसे ही प्रधान शब्द । हाँ वे कई बार ग्राम पंचायत के प्रधान जरूर रह चुके थे । इसलिए प्रधान शब्द जोड़ने की तुक बनती है । हालाँकि जरा गौर करने पर यह शब्द नाम के बाद लगाना ऐसा लगता है कि जैसे सरकार ने या गाँव ने उन्हें जीवन भर के लिए प्रधान नियुक्त कर दिया हो । जबकि यह वास्तविकता नहीं थी । प्रधान के चुनाव हर पाँच साल बाद होते ही थे । हाँ, इनमें दो-चार साल खिसक जाना कोई अचरज की बात नहीं । जब सरकार का ही कोई ठिकाना न हो तो पंचायत के चुनाव कौन कराए । लेकिन फिर भी चुनाव तो होते ही थे ।
गाँव में हालाँकि राजपूत जाति के लोगों का ही बहुमत और दबदबा था, लेकिन हकीकत यह थी कि राजपूत दो धड़ों में बँटे हुए थे । हर ड़े में लगभग बराबर के लोग थे । यानी निश्चित परिवार थे जो हमेशा के लिए धड़े के साथ संयुक्त थे । उनमें आसानी से कोई फेरबदल नहीं होता था । गाँव की दूसरी तमाम जातियाँ भी इनमें से किसी एक धड़े के साथ संबद्ध थीं । उसमें भी कोई फेरबदल नहीं होता था । उनकी संख्या भी लगभग बराबर-बराबर ही थी । इसलिए यह पहले से तय नहीं हो सकता था कि चुनाव में किस ड़े की जीत होगी । फिर भी शिवचरन पहली बार प्रधान बनाए गए । बिना चुनाव के । कलक्टर ने उनके नाम का प्रस्ताव किया और इससे पहले कि कोई कुछ कहे उन्होंने उसका अनुमोदन कर पंचायत की आम सभा भंग कर दी ।
कलक्टर का ऐसा करना आकस्मिक नहीं था । इसके पीछे ठोस कारण थे । पूरा गाँव किसानों का था - छोटे, मझौले और बड़े । लेकिन इसके बावजूद यह था कि मझौले और बड़े किसान खेती-बाड़ी के काम में उसी तरह से लगे रहते जैसे छोटे किसान । वे भी खेतों में जाते, जरूरत पड़ने पर हल-बैल का काम भी कर लेते । इसलिए सब किसान ही थे । लेकिन शिवचरन को कभी किसी ने खेती-बाड़ी का कोई काम करते नहीं देखा । न उनके घर में से किसी को । उनके दो हलवाहे थे जो खेती का सारा काम करते । ऐसा लगता जैसे शिवचरन को खेती-बाड़ी से कुछ लेना-देना नहीं है । इसलिए उनके हलवाहे पूरी स्वतंत्रता से काम करते ।
यही कारण था कि उनकी वेशभूषा भी किसानों से अलग होती । वे हमेशा धोबी से धुला कलफ लगा खादी का कुर्ता, खादी की धोती, खादी की गांधी टोपी, कढ़ाई वाली कश्मीरी जूतियां, और टखनों तक के जुर्राब पहनते । लंबा पतला शरीर था इसलिए इस बाने में वे बहुत ही गरिमापूर्ण और सुन्दर  दिखते । उनका चलने का अंदाज भी बहुत शालीन था और लोगों से बात करने का भी । उनमें नेतृत्व के स्वाभाविक गुण थे और सामने से गुजरने वाले लोग उन्हें देखते ही प्रणाम में झुक जाते । यहाँ तक कि विरोधी धड़े के लोग भी ।
एक और बात यह थी कि गाँव में जो बड़ी तीन हवेलियाँ थीं, शिवचरन की हवेली उनमें थी जिसमें उनके परिवार के साथ उनके दो अन्य भाइयों के परिवार रहते थे । हवेली से अलग गाँव के पूरब के छोर पर उन्होंने एक शानदार बैठक बनवा ली थी । बैठक में एक बड़ा हाल था, दोनों किनारों पर मेहमानों के ठहरने के लिए दो-दो फर्नीचर और बिस्तरमय कमरे थे । सामने की तरफ बड़ी खुली जगह थी जो रास्ते से लगभग आठ फीट की ऊँचाई पर थी । खुली जगह में दो नीम के पेड़ थे, जिनके नीचे चारपाइयाँ बिछी रहतीं और कई हुक्के रखे रहते । आते-जाते लोग बैठक पर बैठकर सुस्ताते और हुक्का में दम लगाते । चिलम के लिए आँच हमेशा उपलों में गरम रहती ।
बैठक के बड़े हाल में 10-12 कुर्सियों वाली मेज थी और उसके चारों ओर चार कोनों में काफी टेबल और कुर्सियां बिछी रहतीं । कोई भी उस बैठक को देखकर कह सकता था कि प्रधान जी ने यह सजावट किसी ब्रिटिश अफसर के बंगलों से सीखी होगी । पूरे गाँव में ही नहीं, पूरे इलाके में इस बैठक की प्रसिद्धि थी । वहाँ हमेशा एक आदमी तैनात रहता जो आने वाले लोगों के रहने-सहने, खाना-चाय, हुक्का-पानी का इंतजाम करता ।
वह बैठक एक होटल या मोटल का काम भी करती । यही कारण था कोई भी सरकारी अधिकारी गाँव में या आसपास के गाँवों में आता तो रात को बैठक में ही ठहरता । बैठक के दो कमरे बड़े अधिकारियों और नेताओं के लिए रिजर्व थे और दो बाकी के लिए । बाबू शिवचरन सारे काम निपटाकर शाम के समय ही बैठक पर आते । जब कोई बड़ा अधिकारी या नेता आ जाता तभी वे उसके साथ दिन में दिखाई पड़ते ।
शिवचरन को न तो हुक्का-बीड़ी का शौक था, न खाने-पीने का । इसलिए जब वे बैठक पर आते तो बाहर चारपाइयों पर हुक्का गुड़गुड़ाते लोगों के बीच न बैठ सीधे बैठक के अंदर अपने दफ्तरनुमा कमरे में चले जाते, जिसमें एक मेज-कुर्सी, एक दीवान, दीवारों की शीशों की अलमारियों में सजावट की चीजें और क्राकरी रखी होती । उसी मेज पर बैठकर वे लोगों से मिलते या अपना काम करते ।
अब आप समझ गये होंगे कि क्यों कलक्टर ने पहली बार में ही उनके नाम का प्रस्ताव किया । उनकी बैठक सबके लिए पाँच-सितारा सुविधाएँ मुहैया कराती थी, बिना दाम । कोई भी अधिकारी जब चाहे आ जाय और जब तक चाहे रहे । बढ़िया रहने का प्रबंध और घर से टिफिन में बनकर आता बढ़िया निरामिष-सामिष भोजन, चाय-नाश्ता, दूध-दही ।
मतलब यह कि जिला भर के अधिकारियों में उनकी बड़ी इज्जत थी । कहाँ से करते थे यह सब इंतजाम वे ? माना कि बड़े किसान थे लेकिन हलवाहों के सिर जो अनाज वगैरह होता था वह बस घर के खाने पीने और मेहमानों के लिए ही पर्याप्त था । बाजार में बेचने के लिए कुछ नहीं बचता था ।
असल में शुरू में ही उन्होंने तय कर लिया था कि कुछ अलग हट कर काम करेंगे । इसलिए उन्होंने दिल्ली के एक उद्योगपति को राजी किया था कि वह ईंट बनाने का भट्टा लगाने के लिए पैसा लगाए, भट्टे के लिए 10-20 एकड़ जमीन वे देंगे । इस तरह बहुत बड़ा भट्टा स्थापित हुआ और खूब चला । पूरे इलाके में ईंटों की सबको जरूरत थी इसलिए पकाई का काम शुरू होने से पहले ही ईंटों की एडवांस बुकिंग हो जाती । बरसात के दो महीनों को छोड़कर बाकी सारा साल काम चलता । राजस्थान से स्थाई रूप से रह रहे 100 परिवार भट्टे पर काम करते । इसलिए शिवचरन प्रधान को पैसों की कभी किल्लत नहीं रही ।
उनकी जिन्दगी बहुत शान की थी । इसलिए गाँव में दो विरोधी धड़ होने के बावजूद वे कई साल तक प्रधान चुने जाते रहे । एक बार विरोधियों ने उनके खिलाफ प्रत्याशी खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन उनके सामने कोई भी किसान कहाँ ठहरता । वह गाँव भर में उपहास का पात्र बन जाता । फिर या तो खुद ही अपना नाम वापस ले लेता या चुनाव के दिन हार जाता ।
एक कारण यह भी था कि शिवचरन छोटी जातियों के लोगों की बहुत सहायता करते इसलिए बाकी सब लोग उनके अहसान के नीचे दबे रहते । कोई उनका मुखर विरोध नहीं कर पाता ।
यह सब ऐसे ही चलता रहता और हम इस कहानी को एक अच्छी सुखांत कहानी की तरह खत्म करते । लेकिन इसमें काफी कुछ जुड़ना बाकी था ।
शिवचरन को दो लड़कियां थीं । उनके दोनों छोटे भाई चालीस पार कर चुके थे लेकिन अभी तक निस्संतान थे । दोनों में से एक ने दो बार खरीद कर औरत घर में रखने की कोशिश की लेकिन संतान का सुख फिर भी प्राप्त नहीं  हुआ । घर में कलह बढ़ी सो अलग । धीरे-धीरे गाँव में यह धारणा बनने लगी कि हवेली में ही कोई बात है जो खानदान ही खत्म होने के कगार पर हैं । लड़कियों को तो खानदान में शामिल इसलिए नहीं किया जाता कि वे तो पराया धन हैं, शादी के बाद दूसरे खानदान की वारिस बन जाती हैं ।
थोड़े दिन बाद जब प्रधान जी की दोनों लड़कियों की दूर कहीं शादी हो गई तो पूरी हवेली सूनी हो गई । अब उसमें तीन बूढ़े दंपत्ति रात को सोते थे । पहली बार लोगों ने बाबू शिवचरन के चेहरे पर चिंता की घनी रेखाएं खिंचती देखीं । उनका दुख और एकाकीपन साफ नजर आता । कई बार तो वे कई-कई दिन बाहर ही रहते, न घर आते, न बैठक पर । गाँव में होते तो भी हवेली के अंदर की एक कोठरी में अंधेरे में ही लेटे रहते, न बाहर निकलते, न बैठक पर आते ।
इससे बाकी के कामों में भी उनकी दिलचस्पी धीरे-धीरे खत्म होने लगी । इसका सबसे पहला शिकार तो भट्टे का व्यापार हुआ । वैसे भी जब बुरे दिन आते है तो सब तरफ से बुरी खबरें आने लगती हैं । यह मानना भी सही होगा कि बाहर जो अच्छा और बुरा होता है वह अंदर के मन की हालत का ही तो अक्श  है । सरकार ने सभी भट्टों को बंद करने का आदेश जारी कर दिया । इसलिए कि ईंट बनाने के लिए हर साल खेतों से इतनी मिट्टी खोदी जाती कि दूर-दूर तक के खेत तालाब में बदल गए । फसलों के लिए बेकार । किसान थोड़े पैसों के लालच में अपने खेत भट्टों को मिट्टी खोदने के लिए दे देते । लेकिन एक-दो साल बाद वे किसी लायक नहीं रह जाते थे ।
सरकार का आदेश इसी संदर्भ में था । यदि आदेश न भी आया होता तो भी शिवचर के भट्टे को तो बंद होना ही था । उनकी दिलचस्पी अब किसी काम में नहीं रह गई थी । ऐसे कितने दिन चलता । उनके खर्चे इतने बढ़े हुए थे कि उनकी पूर्ति केवल हलवाही खेती से नहीं हो सकती थी । भट्टे की आमदनी से उसकी पूर्ति होती थी । उसके न रहने पर कर्ज लेकर खर्चे चलने लगे । बाबू शिवचरन प्रधान को कर्ज देने में भला किसको परेशानी होती । और एक दिन वह अनहोनी घट गई जिसकी लोगों को काफी समय से आशंका थी । सुबह खबर मिली कि प्रधान जी हवेली की कोठरी में रात को ही इहलोक सिधार  गए । उनकी मृत्यु के कुछ दिन बाद ही उनकी पत्नी भी गईं ।
दो लड़कियां और दामाद थे दूर-दराज के गाँवों में । दोनों लड़कियां खाते-पीते घरों में गई थीं । लेकिन जैसे ही शिवचरन ने प्राण छोड़े तो छोटा दामाद उनके काम को संभालने के लिए हवेली में रहने लगा । शिवचरन एक बड़े किसान थे और उनके हिस्से में काफी जमीन थी । छोटा दामाद बहुत ही सज्जन और मेहनती था । उसने उनके खेतों को ठीक से सँभाल लिया ।
फिर अचानक गाँव में खबर फैली की दामाद ने दिल्ली के किसी व्यापारी के साथ करोड़ों रुपये में पूरी जमीन का सौदा कर लिया है और मोटी रकम एडवांस में लेकर अपने गाँव वापस चला गया है । बड़े दामाद तक यह खबर पहुंची तो वह परिवार और कुछ अन्य लोगों को लेकर हवेली में आ गया । उसने घोषणा कर दी कि उसकी मर्जी के बिना खेत किसी को नहीं बेचे जा सकते । उसने अपने वारिस होने का दावा कोर्ट में ठोंक दिया । उधर जिस व्यापारी ने छोटे दामाद से जमीन का सौदा किया था, उसने खेतों का कब्जा न मिलने पर जालसाजी का केस ठोंक दिया । इस तरह दोनों तरफ से मुकदमेबाजी चलने लगी । गाँव के लोगों के लिए यह एक नया तमाशा बन गया । दोनों दामाद और बेटियों को एक-दूसरे की नीयत पर इस कदर अविश्वास हो गया कि दोनों खेमों के परिवार आकर हवेली में रहने लगे । रोज झगड़ा होता, गाली-गलौज होती और फसाद होता । आखिरकार नौबत फौजदारी की आ गई । जिसका दाव लग जाता वही दूसरे पर हमला करवा देता ।
इस तरह बाबू शिवचरन प्रधान का नाम रोशन हुआ ।


Saturday, 12 July 2014

स्कूल के वे दिन

स्कूल के वे दिन

[ गुरु पूर्णिमा के अवसर पर स्मृति-स्वरूप]



   उन दिनों स्कूल जाना एक बड़ी समस्या थी । एक दिन की बात हो तो किसी तरह निपट भी लिया जाय । लेकिन इससे तो रोज-रोज जूझना पड़ता । दिन निकला नहीं कि स्कूल का मामला गए कल की तरह फिर मुँह बाए खड़ा  मिलता ।
स्कूल भी गाँव में ही था । बीचों-बीच । किसी दूसरे गाँव में होता तो भी रास्ते में से कोई बहाना बनाकर फूट लिया जा सकता था । लेकिन यह तो सिर पर ही था । घर से निकलो और सामने की अंदर जाने वाली गली पकड़ो और बस पहुँच गए स्कूल । स्कूल में पहुँचे नहीं कि धर लिए गए फिर पूरा दिन के लिए ।
   और एक दिन भी क्या दिन होता । पूरा ब्रह्मा का दिन ।
प्रार्थना
    जाते ही सबसे पहले बाहर के मैदान में सुबह की प्रार्थना की लाइन में लगना पड़ता । वह भी  कोई कम झंझट नहीं । पहले ढूँढो कि अपनी क्लास की लाइन कौन सी है । लाइन मिल भी गई तो उसमें अपने कद के हिसाब से अपनी जगह चुनो । सब लाइनें एक-दूसरे से इतनी सटी हुई होतीं कि पहले उनमें घुसना ही मुसीबत । किसी तरह घुस भी गए तो यह तय करना मुश्किल कि अपना कद किसके पहले या किसके बाद आता है ।
अब खुद कैसे जानें कि अपना कद कितना है !
लड़के एक-दूसरे के पीछे सीमेंट की तरह ऐसे जुड़े खड़े होते कि बिना हाथापाई के उन्हें खिसका कर घुस जाना कोई आसान काम नहीं था । ऊपर से मास्टर लोग सामने की तरफ एक चबूतरे पर खड़े होकर सब देख रहे होते । अगर किसी से घुसने में कुछ खींचतान हो गई तो वे दनाक से कमची (कच्चे शहतूत के पेड़ की लपलपाती लंबी डंडी जिसे खासतौर पर पीटने के लिए मंगवाया जाता ) कमर पर सड़ाक से खींच देते । उन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि गलती किसकी है ।
    मतलब यह कि सबसे पहले तो प्रार्थना के वक्त ही अपना कमची खाने का नंबर अक्सर आ जाता ।
    एक कारण तो यह था कि लाइन में पहले से घुसे लड़के किसी नए को इस डर से घुसने नहीं देते कि कहीं वे खुद न बाहर हो जाएँ या मास्टर जी की नजरों में न आ जाएँ । दूसरे, हमसे ज्यादातर लड़कों का खास प्रेम भी था । हम चार लड़कों का जो एक दोस्ताना सा गुट स्कूल में अपने आप बन गया था, सब उसके लिए परेशानी खड़ी करने की फिराक में रहते । इसलिए मास्टर लोग हम पर खास नजर रखते । कहीं कुछ हो गया और हम आसपास हों तो वे मानकर चलते कि बस हमारी ही कारस्तानी होगी ।
    एकाध कमची झेलकर किसी तरह लाइन में घुस गए तो वहाँ खड़ा रहना किसी यातना से कम नहीं होता । सब लोग बस यूँ ही फालतू में एक जगह पर खड़े हैं बेबात और बस । यह भी कोई बात हुई । मास्टर लोग हैडमास्टर के आने का इंतजार करते । हैडमास्टर हमेशा दस-पंद्रह मिनट देर से ही आता । इन दस पंद्रह मिनटों में धक्का-मुक्की लगातार चलती रहती और लाइन में टिके रहने के लिए पूरा जोर लगाए रहना पड़ता ।
    हैडमास्टर आता तो हमें अटैंशन की मुद्रा में खड़ा होने का निर्देश  मिलता । फिर लाइन में सबसे आगे खड़ा होने वाला क्लास का मानीटर लड़का अपनी क्लास के मास्टर के पास जाकर कान में कुछ कहता । मास्टर फिर चलकर हैडमास्टर के पास जाकर उसके कान में कुछ कहता । कान में ये लोग क्या कहते किसी को मालुम नहीं । बहुत पूछने पर भी ये मानीटर बताते नहीं थे और सब पर रौब गांठते जैसे क्लास के लड़कों के बारे में गुप्तचर रपट देते  हों ।
    बाद में पता चला कि वे क्लास के उपस्थित लड़कों की संख्या बताते हैं ।
    अब प्रार्थना शुरू होती । इतने दिन से रोज-रोज यह प्रार्थना गाई जा रही थी कि मुझे उसके नाम से ही झुरझुरी आने लगती । लगता वह कोई ऐसा पक्का राग है जो अनंत तक चलेगा । प्रार्थना गाने वाले लड़के खड़े होकर बड़े बेसुरे सुर में गाते :
      " वह शक्ति हमें दो दयानिधे
       कर्तव्य मार्ग पर डट जाएँ
       पर सेवा पर उपकार में हम
       जग जीवन सफल बना जाएँ ।"
सब बच्चों में होड़ लग जाती कि कौन कितना गला फाड़कर गाता है ।
    पूरी प्रार्थना हजारों बार गाई होगी लेकिन नहीं मालुम वह किसके बारे में है । बस "डट जाना" जरूर समझ में आता । मतलब कुछ भी हो जाए लाइन में डटे रहना है, हटना नहीं है, नहीं तो कमची की सड़ाक होगी ।
    गला फाड़कर गाने में सब हलकान हो जाते । तब जाकर वह किसी तरह पूरी होती ।
    कई होशियार लड़कों से उसका मतलब पूछा तो उन्होंने बस इतना बताया कि वह भगवान के बारे में है । अरे इतना भी नहीं मालुम कि "दयानिधे" क्या होता है ? दया का समुद्र यानी भगवान । लेकिन जो रोज-रोज सब बच्चों को लाइन में खड़ा करके इतना परेशान करे वह कहीं से दयानिधे नहीं लगता । कुल मिलाकर यही लगता कि यह भगवान चाहे जो हो कोई अच्छा आदमी तो होगा नहीं । यह तो अपने बड़े दादा से भी खूसट होगा ।
    उसके बाद उसका सबसे त्रासदायक अध्याय शुरू होता । हैडमास्टर रोज ही कोई बड़ी महान बात बताने के लिए निकाल कर ले आता और आधा घंटा तक बोलता रहता । कहने को तो हमें अपनी जगह बैठने की इजाजत दे दी जाती लेकिन ऐसे सुन्न बैठने से तो खड़ा रहना ही ठीक लगता । उसमें कम से कम जोर-आजमाइश तो चलती रहती । बैठने के बाद तो सुनने के अलावा कुछ किया ही नहीं जा सकता था ।
    लगता था हैडमास्टर कोई हाड माँस का बना प्राणी नहीं था बल्कि  उच्च विचारों ने ही शरीर धारण कर लिया था । वह कुछ थुलथुल सा था और हमें लगता कि वह बस एक बोरा है जिसमें उच्च विचार भरे पड़े हैं । वह पहले तो किसी महान का कोई किस्सा सुनाता और फिर हमें उसकी राह पर चलकर वही बनने के लिए कहता । वह बताता कि यह स्कूल हमें वह बनाकर रहेगा ।
    हालाँकि जबसे मैं इस स्कूल में आया था तबसे यही हैडमास्टर यहाँ था और वह जस का तस था । वह कहीं से महान नहीं बना था । अब वह जो खुद इन महान विचारों से भरा होकर कुछ नहीं बन पा रहा तो हमें क्या बनाएगा ।
    लेकिन कई बच्चे थे जो उसकी बातों के झाँसे में आ जाते और अपने को सचमुच गाँधी या नेहरू या बुद्ध या सुभाष समझते । वे वैसा ही आचरण करने लगते ।
ऐसे बच्चे बहुत खतरनाक होते । वे खुद तो महान बन ही चुके होते दूसरों को भी सुधारकर महान बनाना अपना कर्तव्य मानते । हर छोटी-छोटी बात को लेकर वे शिकायत करने मास्टर या हैडमास्टर के पास पहुँच जाते और लोगों की बात-बेबात धुनाई कराते । हम लोगों का तो उनसे साँ-नेवले जैसा बैर था । हम उनसे हमेशा बचकर ही रहते ।
    हैडमास्टर का प्रवचन रोज ही होता । हम उसके दौरान न तो कहीं और देख सकते थे, न सो सकते थे । बस आँखें खोले एकटक उसे ऐसे देखना होता जैसे उसकी बातें अमॄत की बूंदें हैं जिन्हें हम पी रहे हैं । इस जबरदस्ती में शरीर, आँखें, मन सब थककर चूर हो जाते ।
    बस एक ही गनीमत थी । कुछ दिन तक उसे भाषण करते समय एकटक देखने पर एक चमत्कार घटित होने लगा । जैसे जब हम खेत में आसमान की तरफ मुँह करके लेटते थे तो वहाँ घूमते बादलों में कितनी ही शक्लें दिखाई देने लगतीं । कई बार तो पूरी कहानी सी बन जाती । वैसा ही यहाँ होने लगा ।
    मैं जब टकटकी लगाए हैडमास्टर का प्रवचन सुन रहा होता तो अचानक उसका चेहरा अनेक आकारों में बदलने लगता । कभी वह कुत्ता बन जाता, कभी बकरी तो कभी हाथी । कई बार तो ऐसा लगता जैसे वह बेर का झाड़ है । और भी कितना कुछ । मैं इसे देख-देख मगन होता । इसमें पूरा प्रवचन कट जाता ।
    प्रवचन पूरा होता तो फिर सबको खड़ा कर दिया जाता । मानीटर अपनी क्लास के सब लड़कों के नाखून देखता । सबको अपने हाथ बाहर को उलटी हथेली की ओर से फैलाकर खड़ा होना पड़ता । जिसके नाखून बढ़े मिलते उन्हें बाहर छाँट लिया जाता और कमची पड़ती । नाखून का यह इन्सपैक्शन रोज न होकर किसी भी दिन अचानक हो जाता । इसलिए मुश्किल यह थी कि यह नाखून की बात बस उसी दिन और समय पर याद आती । हर बार प्रतिज्ञा करते कि घर जाते ही बना लेंगे लेकिन स्कूल से छूटने के बाद स्कूल से जुड़ा हर काम भुला दिया जाता ।


लायकराम की क्लास
    प्रार्थना-स्थल से निकलते तो सीधे क्लास में आते । क्लास क्या थी एक खुले चबूतरे पर अलग-अलग जगहों में मास्टरों की कुर्सियां लगी होतीं जिनके सामने बच्चे नीचे जमीन पर बैठते । एक क्लास और दूसरी क्लास में बस कुछ कदमों का ही फासला होता और सबकी गतिविधियों से सब कोई परिचित रहता । हमारी क्लास में दादा आदम के जमाने की कुर्सी पर मास्टर लायकराम विराजमान  होते । वे मरियल से लंबे कद के थे और उनकी शक्ल पर हमेशा ऐसा घनघोर तनाव बना रहता कि वे सारी दुनिया से खफा हैं । वे हमेशा खीजे रहते और बात-बेबात पर एकाध थप्पड़-घूंसा तो यूँ ही चलते-चलाते जड़ देते ।
    क्लास में यातना का दूसरा दौर शुरू होता । मास्टर लायकराम जब पिछली बार पढ़ाए गणित के पाठ का अभ्यास कराते । वैसे ही मुझे गणित कभी समझ नहीं आता । पहले ही अध्याय में मेरा तो दिमाग घूम जाता ।
बहुत सी समझ में न आने वाली बातों में यह भी एक था । मसलन स्कूल की पढ़ाई के बारे में यह बात कभी मेरी समझ में नहीं आई कि स्वतंत्र रूप से प्रकृति और तमाम जीवधारियों की लीलाओं का हिस्सा होकर सीखने से अधिक यह बंद कमरों की जबरदस्ती की रटाई कैसे बेहतर शिक्षा दे सकती है !
    वैसे ही गणित के बारे में पहली बात तो यही कि लाख कोशिश करने पर भी मेरी समझ में यह बात नहीं आ पाती कि यह एक और दो का क्या मतलब है । मास्टर एक पैंसिल लेता और पूछता कि कितनी पैंसिल हैं । सब बच्चे चिल्लाते कि एक । फिर वह दूसरी पैंसिल लेता और पूछता कि कितनी पैंसिल हैं । सब बच्चे चिल्लाते कि   एक । अब वह दोनों पैंसिलों को एक साथ पकड़ता और पूछता कि अब ? सब बच्चे जोर से चिल्लाते कि दो । अब वह सामने रखे बोर्ड पर लिखता 1 जमा 1 बराबर 2 । सब बच्चे बहुत खुश होते कि गणित भी क्या बायें हाथ का खेल  है ।
    फिर वह दोनों पैंसिलों में से एक को अलग कर देता और पूछता कि अब कितनी हैं । बच्चे चिल्लाते कि एक । और फिर वह बोर्ड पर लिखता 2 घटा 1 बराबर 1 ।
    मैं भी सब बच्चों के साथ चिल्लाता "एक","दो","एक" । लेकिन फिर मेरा दिमाग चल जाता । यह एक-दो का क्या मतलब ? पाँच, सात, दस क्यों नहीं ? या यही क्यों, गाय, भैंस, बैल क्यों नहीं ? यह भी कोई बात हुई कि आपने कह दिया यह और हमने मान लिया ? यानी कल अगर आप गाय को पैंसिल कहें या भैंस को चार कहें तो क्या हम कुछ भी मानते जायं ? आखिर कोई तुक भी तो होनी चाहिए कि नहीं ?
    इस ऊहापोह में सब गड़बड़ हो जाता और कुछ याद नहीं रहता । बस एक ही उपाय दिखता कि सब कुछ को रट लो । लेकिन दिन-ब-दिन नए-नए अध्याय जुड़ते जाते और उन्हें रटना असंभव हो जाता । अब वह जो पूछता उसका बेखटके कुछ भी जवाब दे दिया जाता । मसलन रटा हुआ आठ सत्ते पूछा गया तो फटाक से सही जवाब निकला छप्पन । लेकिन अगर उसने कोई बड़ी संख्या दे दी तो फिर तो जो मन में आया कह दिया ।
    अब गलती तो किसी से भी हो सकती है । मैंने देखा कि कई बहुत होशियार लड़के भी बड़ी संख्याओं की गिनती में गड़बड़ी कर जाते । इसलिए हम करते तो क्या हुआ । एक गलती की सजा एक कमची ही तो थी । 
    लेकिन कमची का हल्का और जोरदार होना भी बड़े मजेदार तर्क पर  था । क्योंकि हम लोगों को तो लगनी ही होती थीं और शायद मास्टर भी बोर हो चुका था इसलिए वह जल्दी में हल्के से मारकर हमें हटा देता । लेकिन जो होशियार लड़के कभी-कभार फँसते, उनकी तो शामत ही आ जाती । पहले तो वह बहुत देर तक कमची लपलपाते उनका मजाक उड़ाता : " क्यों बेट्टा, बहुत होशियार समझते हो । आज झाड़ दूंगा सारी होशियारी ।" जब उनकी घिग्घी बँध जाती तो पूरा जोर लगाकर सड़ाक से कमची मारता और मजा आने पर कई बार तो एक के बदले में दो-तीन भी जड़ देता ।
    कमचियों का चक्कर भी अजीब था । पिछले दिन ही तय हो जाता था कि कल कमची लाने की ड्यूटी किस की है । वह सुबह बढ़िया तीन चार कमचियाँ स्कूल आते समय रास्ते के पेड़ से लेकर आता और मास्टर जी की कुर्सी पर रख देता । लेकिन क्योंकि कमचियों की जरूरत बहुत ज्यादा पड़ती थी इसलिए कई बार वे बीच में ही खतम हो जातीं । ऐसे में कमची पड़ने वाले लड़के को ही कमची लेने भेजा जाता ।
    शहतूत का पेड़ गाँव के बाहर स्कूल से कुछ ही दूरी पर था । लड़का जाता और कमची ले आता । कमची अगर मजबूत न हुई तो उस लड़के को दुगनी मार पड़ती और नई मजबूत कमची लानी पड़ती ।
    किसी दिन मुझे भी दोपहर के बाद कमची लाने जाना होता । मैं बजाय कमची लाने के शहतूत के पेड़ पर बैठ आराम से शहतूत खाता और कुछ बाद में खाने के लिए जेब में भर लेता । इस तरह स्कूल का समय पूरा हो जाता और मैं वापस स्कूल जाने की बजाय सीधे घर चला जाता । अपना बस्ता लाने का जिम्मा मैंने अपने घर की बगल में रहने वाले लड़के शामलाल को सोंप रखा था । वह हमेशा ले आता ।
    मैंने अक्सर देखा था कि किसी लड़के को कमची लाने भेजने के बाद मास्टर जी अक्सर भूल जाते । जब लड़का लेकर आता तभी उन्हें याद आता । इसका अक्सर मैंने फायदा उठाया । अगले दिन तो नए मुर्गे तैयार हो जाते ।
    कमची के अलावा दूसरा दंड का तरीका था मुर्गा बनना । अगर कोई बच्चा बात करता पकड़ा जाता तो मास्टर जी उसे क्लास के सामने अपनी कुर्सी की बगल में मुर्गा बनने को कहते । इस तरह वह उनकी नजर से ओट रहता । वे और बच्चों को पढ़ाते रहते और मुर्गा बने बच्चे को भूल जाते । इस बीच वह थककर चूर हो जाता और मजे से बैठ जाता ।
मास्टर जी को पता भी नहीं चलता । पता चलता तब जब वह बच्चा अपनी हरकतों से क्लास का ध्यान अपनी तरफ करने की कोशिश करता । वह कभी जीभ दिखाता, कभी तरह-तरह का मुँह बनाता । इससे बच्चों की हँसी छूट जाती और लायकराम जी को बोध होता ।
    अब समझो उसकी मुसीबत होती । मास्टर जी पढ़ाई छोड़ सारा ध्यान उस पर केंद्रित करते । वह थककर बैठ न जाय इसलिए पीछे की तरफ तखती खड़ी करवा देते । अगर जरा सा भी नीचे झुके तो तख्ती गिरेगी और मास्टर जी को पता चल जाएगा । इससे मुक्ति या तो क्लास खत्म होने पर मिलती या कोई बच्चा थककर रोने लगता तो उसे कमची मारकर बिठा दिया जाता ।
हैडमास्टर और लायकराम की तू-तू , मैं-मैं
    बच्चों के लिए स्कूल का सबसे मनोरंजक समय तब होता जब लायकराम मास्टर और हैडमास्टर किसी बात पर भिड़ जाते । और बच्चों को इस भिड़ंत के लिए अधिक इंतजार करना भी नहीं पड़ता । स्कूल में एक से लेकर पाँचवी तक की पढ़ाई होती थी । वैसे तो स्कूल में पाँच कक्षाओं के लिए कम-स-कम पाँच मास्टरों और एक हैडमास्टर की जरूरत थी लेकिन यहाँ हैडमास्टर के अलावा दो और मास्टर थे - एक लायकराम और दूसरे मूलचंद ।
    हैडमास्टर तो पाँचवी क्लास को ही पढ़ाता था लेकिन मूलचंद और लायकराम दो दो क्लासों को एक साथ लेकर बैठते । जब वे दूसरी क्लास को पढ़ाते तो पहली क्लास को मानीटर के हवाले कर देते जो पढ़ाए हुए का अभ्यास कराते रहते । अध्यापकों की कमी के बारे में कई बार मास्टरों और हैडमास्टर ने ग्राम पंचायत की तरफ से बोर्ड को चिट्ठी लिखाई थी । लेकिन उसका कोई जवाब नहीं आता था । पंचायत के लोग छठे-चमासे जब बिसरख कस्बे में जाकर अफसर से मिलते तो उन्हें यही जवाब दिया जाता कि शुकर मनाओ स्कूल चल रहा है । फंड की जो हालत है उसमें न जाने कितने गाँवों के स्कूल बंद कर दिए गए हैं ।
    स्कूल बंद होने के डर से लोग चुपचाप लौट आते । हैडमास्टर और मास्टरों को लगता कि कहीं उनकी नौकरी ही न चली जाए । इस अंदेशे में वे एक दूसरे को शक की निगाह से देखते । उन्हें लगता कि दूसरा या तो अधिकारियों से उनकी शिकायत कर रहा है या ग्राम पंचायत से उसकी शिकायत ऊपर पहुँचवा रहा है । इससे एक-दूसरे के खिलाफ उनसे जो बन पड़ता उसमें कोई कसर न छोड़ते ।
    लायकराम क्योंकि जूनियर थे इसलिए उनका मानना था कि हैडमास्टर बोर्ड में लगातार उनकी लिखित शिकायत भेजता है । उसके खिलाफ अभियान में वह बच्चों को शामिल करने की कोशिश करते ।
    लायकराम और मूलचंद मास्टर पाँच सात मील दूर के गाँवों में रहते थे इसलिए साइकिल से रोज आते-जाते । लेकिन हैडमास्टर किसी दूसरे जिले का था इसलिए स्कूल के अंदर बनी एक कोठरी में सो जाता । उसका खाना कभी किसी बच्चे के घर से, कभी किसी बच्चे के घर से आता । इसके बदले में वह रात को कुछ बच्चों को बुलाकर पढ़ा देता ।
यह लायकराम के लिए ईर्ष्या का दूसरा कारण था ।
    लायकराम खुले आम क्लास में बताते कि यह हैडमास्टर बहुत ही पाजी है और बच्चों के चरित्र को भ्रष्ट कर रहा है । एक तरफ तो बच्चों के माँ-बाप से नंबर दिलाने के नाम पर पैसा उगाहता है । और रात की पढ़ाई ? लायकराम डंके की चोट कहते कि इस हैडमास्टर का लौंडागिरी का पुराना इतिहास है । यह साला रात को पढ़ाने के नाम पर लौंडागिरी करता है ।
    और यह एकदम बेबुनियाद बात भी नहीं थी । सब बच्चे भी जानते थे कि हैडमास्टर का लौंडा कौन है ।
    वह लौंडा था सुरेश । सुनार का लड़का । खूब गोरा-चिट्टा । रहने वाला था दिल्ली के चांदनी चौक के अशरफी कटरा का । बचपन में ही माँ बाप गुजर गए तो मौसी ने उसे पढ़ाई के लिए गाँव में अपने बहनोई के घर रख दिया कि यहाँ सस्ते में परवरिश भी हो जायगी और पढ़ भी लेगा ।
हैडमास्टर उसे हमेशा अपने साथ ही बिठाए रखता और छुट्टी हो जाने पर भी किसी काम के बहाने से रोक लेता ।
    इसलिए सब बच्चे जानते थे कि वह हैडमास्टर का लौंडा है । लेकिन हैडमास्टर को इसकी कोई परवाह नहीं थी । वह हमेशा लड़ाई पर आमादा लायकराम से बचता । लेकिन फिर भी बात यहाँ तक बढ़ जाती कि दोनों युद्ध में कूद ही पड़ते । पहले तो अपनी-अपनी जगहों पर बैठे-बैठे ही वाकयुद्ध होता । इसमें दोनों एक-दूसरे की पोल खोलते और नए-नए तथ्य सामने लाते । इससे बच्चों को बड़ा मजा आता ।
    लेकिन बात बढ़ती ही जाती और लगने लगता कि अब केवल बातों से कुछ होने वाला नहीं है । लायकराम और सब बातें सह सकते थे लेकिन अपनी शारीरिक बनावट का मजाक उड़ाया जाना उन्हें बिल्कुल बर्दास्त नहीं होता । लायकराम जब हैडमास्टर पर लौंडागिरी का आरोप लगाता तो हैडमास्टर पलटवार कर उसे नपुंसक बताता ।
    कुर्सी से उठकर लायकराम दूसरे कोने में हैडमास्टर की चारपाई की तरफ लपकते । तब मास्टर मूलचंद हरकत में आते और लायकराम को पकड़कर वापस उनकी जगह लाने की कोशिश करते । जब वे बैठ जाते तो मास्टर मूलचंद की भूमिका खत्म हो जाती । वे उससे ज्यादा उनके बीच दखल नहीं देते थे, न उन्हें समझाने की कोशिश करते । उनका काम बस इतना था कि दोनों के बीच हाथापाई न हो ।
    और शायद हैडमास्टर और लायकराम भी इस बात को जान गए थे कि मास्टर मूलचंद के रहते उनमें शारीरिक जोर अजमाइश की नौबत नहीं आएगी । दोनों में किसी को भरोसा नहीं था कि कुश्ती का नतीजा किसके पक्ष में होगा । होने को तो लायकराम कम उम्र के थे लेकिन हैडमास्टर की सेहत उनसे ज्यादा अच्छी थी । इन दोनों की तुलना में मास्टर मूलचंद बहुत ही हॄष्ट-पुष्ट थे । यही कारण था कि यह लड़ाई उस दिन नहीं होती थी जिस दिन मूलचंद छुट्टी पर  होते ।

पहाड़े रटने का दौर या पटकम-पटकाई
    और आखीर में आता पहाड़े रटने का दौर । जब मास्टर लायकराम घोषणा करते कि सब लोग आमने-सामने दो लाइनों में खड़े हो जाओ और पहाड़ों का अभ्यास करो तो समझो छुट्टी होने में दस-पंद्रह मिनट ही बाकी हैं । छुट्टी के नाम से ही सब बच्चे बेकाबू हो जाते । लगता पूरी क्लास में बलवा हो गया है । जिसका जिस पर बस चलता उसे बोरी की तरह उठा कर पटक देता । कोई कुश्ती में गुत्थमगुत्था होते । यानी कि लाइन बनाने से पहले पाँच मिनट का समय पूरे दंगल का होता ।
    लायकराम भी इस बीच अपने घर वापस जाने की तैयारियों में लग जाते और बच्चे अपने भरोसे होते । केवल क्लास के मानीटर लोग किसी तरह से रुआँसे से बने बच्चों को समझाने की कोशिश करते ।
    पहाड़े बोलने का एक तरीका था । दो लाइनों में सारे बच्चे लगभग 3-4 फीट की दूरी पर आमने-सामने मुँह करके खड़े हो जाते । पहाड़ा हमेशा 'दो एकम दो' से शुरू होता और सामने की लाइन के बच्चे जवाब में बोलते 'दो दूना चार' । इस तरह से यह सिलसिला एक बार शुरू हो जाता तो काफी दूर तक जाता जब तक कि लायकराम आकर छुट्टी का आदेश नहीं सुनाते । कई बार तो इसमें देर हो जाती और पहाड़ा पच्चीस-तीस की संख्या को भी पार कर जाता ।
    जाहिर है कि आम बच्चे दस तक के पहाड़ों में तो पूरी तरह भाग लेते लेकिन बाद में तो कमान केवल रट्टूमल छात्रों के हाथ में ही रहती और बाकी लाइन के लड़के बस उनकी नकल करते । नकल करना भी आसान नहीं होता इसलिए वे बस ' हो हो हो हो' की तर्ज से साथ देते रहते ।
    लेकिन पहाड़े बोलते-बोलते कुछ ऐसा जोश पैदा हो जाता कि स्वर ऊंचा तो होता ही जाता त्वरित भी होता जाता । ऐसा लगता मानो आमने-सामने की लाइनों के बीच जबरदस्त कंपिटीशन शुरू हो गया है । एक जितनी जोर से बोलता दूसरा उससे ज्यादा जोर से बोलने की कोशिश करता । फिर यह उत्तेजना इतनी बढ़ती जाती कि एक लाइन के बच्चे चीखते हुए सामने की लाइन की तरफ झुकते और हाथ को ऐसे घुमाते जैसे उन पर पत्थर फेंक रहे हों ।
    धीरे-धीरे लाइनें एक-दूसरे के समीप सरकने लगतीं और एक समय ऐसा आता जब दोनों के हाथ एक-दूसरे को छूने लगते । पहले यह छुवमछुवाई हथेलियों पर चटका कर ताली देने तक चलती लेकिन धीरे धीरे आमने-सामने में से जो ताकतवर होता वह बच्चा अपने सामने वाले का हाथ पकड़कर अपने पाले में खींच लेता । इस तरह कबड्डीनुमा खेल से होता हुआ यह मैच बाकायदा कुश्तियों में बदल जाता और पटकम-पटकाई शुरू हो जाती । तब जाकर दूर बैठे लायकराम जी की तंद्रा टूटती और वे वहीं से जोर से आवाज देकर छुट्टी की घोषणा कर देते ।
रास्ते में हिसाब-किताब
    वैसे तो स्कूल गाँव के बीच में ही था और वहाँ से गाँव के किसी भी घर में गलियों से होकर कुछ मिनटों में ही पहुँचा जा सकता था । सुबह क्योंकि लेट होने के डर से जल्दी होती इसलिए सब बच्चे घर से स्कूल की सीधी गली पकड़ते । लेकिन स्कूल से छुट्टी होने पर किसी को घर जाने की जल्दी नहीं थी ।
    ऐसा क्यों था यह किसी को नहीं मालुम था । लेकिन बच्चों के लिए घर और स्कूल में बहुत ज्यादा फर्क नहीं था । स्कूल में तो फिर भी एक हद तक स्वतंत्रता रहती कि यहाँ घर वाले नहीं होते थे । वैसे भी मास्टर जी को छोड़ सब बच्चे बराबर ही होते । शरारतें भी खूब होतीं ।
कमची खाना या मुर्गा बनना बुरा तो लगता था लेकिन ऐसी कोई आफत भी नहीं थी । और फिर इसमें भी सब समान ही थे । इसमें भी मजा आता था । यह एक तरह का नया तमाशा था । जब किसी को कमची लगनी होती तो लगने से पहले, लगने के दौरान और लगने के बाद उसके मुँह पर कितनी तरह के भाव आते जाते । सब बच्चे उन्हें देखकर मजा लेते । यदि किसी दिन किसी को कमची नहीं पड़ी या कोई मुर्गा नहीं बना तो वह दिन बहुत ही मनहूस सा लगता । घटना विहीन । या जिस दिन मास्टर लायकराम किसी कारण छुट्टी पर होते तो पूरी क्लास लावारिस सी हो जाती ।
    इसलिए स्कूल भले ही पढ़ाई की वजह से बोरियत का अड्डा था लेकिन फिर भी वहाँ मनोरंजन के साधन भी थे।
    लेकिन घर में तो मनहूसियत का पूरा साम्राज्य रहता । एक तो बच्चों के लिए पिता, चाचाओं, बाबाओं, बड़े भाइयों वगैरह की पूरी बिरादरी होती जिसके हुक्म का पालन करना पड़ता । दूसरे वहाँ का वातावरण भी बंद सा होता जिसमें लगता सब एक दूसरे पर नजर रखे हैं । क्योंकि हरेक के ऊपर कोई था इसलिए कोई भी खुलकर कुछ नहीं कर सकता था ।
    इसलिए स्कूल से छुट्टी के बाद सब बच्चे गलियों का रास्ता न लेकर एक गली से होकर गाँव के बाहर पोखर के पास के खाली मैदान में निकल आते और वहाँ बस्ते फेंक अपने हिसाब-किताब करते । इसमें मानीटरों की खूब मलामत होती और पढ़ाकू बच्चे दब्बू बने रहते । कई बार तो एकाध की पिटाई भी हो जाती । आपसी कुश्तियों का तो आम रिवाज था । इन कुश्तियों से ही यह तय होता कि ताकत में कौन कहाँ है । उसी हिसाब से फिर उसका रुतबा होता ।
स्कूल के त्रास से त्राण की कोशिश में
छत की मुंडेर के सहारे बिताए दिन
    भले ही स्कूल समय बिताने की कोई अच्छी जगह नहीं थी लेकिन दिन भर घर में बैठे रहने से तो वहाँ बेहतर ही था । इसलिए स्कूल जाने में कोई खास उत्साह की बात नहीं थी तो कोई परेशानी की भी नहीं । बस यूँ ही था ।
    लेकिन कभी-कभी इस रोज की कवायद से मन उकता जाता । तब तो और भी अधिक जब मास्टर ने कोई काम घर से कर लाने को दिया हो । उस दिन योजना बनानी पड़ती कि कैसे क्या किया जाय गाँव का मामला था इसलिए यह तो हो नहीं सकता था कि कहीं दूसरे मुहल्ले में चले जाओ । छोटा सा तो गाँव था और सब लोग सबको जानते थे । यही नहीं, घर के लोग भी काम से हर रोज गाँव में घूमते ही रहते । कभी दुकान से सौदा-सुलुफ लाने जाना है, कभी कुम्हार, लुहार, चमार, सुनार, कहार, बढ़ई, नाई, ब्राह्मण वगैरह के पास जाना  होता । कभी यूँ ही किसी की बैठक पर बैठ हुक्का गुड़गुड़ाना होता ।
    मतलब यह कि स्कूल को छेक गाँव में रहना खतरे से खाली नहीं था ।
    गाँव या घर में रहने में एक और मुसीबत थी । जब कोई बच्चा किसी दिन स्कूल नहीं जाता तो सुबह की हाजिरी लेने के बाद मास्टर दो-चार बच्चों की ड्यूटी लगा देता कि उसे घर से या वहाँ न मिले तो गाँव से ढूँढ कर लाएं । ये बच्चे मास्टर का आदेश मिलते ही उसे अपना पवित्र राष्ट्रीय कर्तव्य मान लेते और पूरे जीजान से इस काम में जुट जाते । वैसे भी उन्हें मालुम था कि असफल होने पर दंड के रूप में या तो कई कमचियाँ खानी होंगी या कई घंटे मुर्गा बनना होगा ।
    ढूँढने के समय पर कोई पाबंदी नहीं थी । बल्कि ये जासूस बच्चे जानबूझकर समय बर्बाद करते और कोशिश करते कि स्कूल के आखिरी घंटों में ही वापस पहुंचें तो कम--कम उस दिन के काम से बच सकते हैं । इसलिए वे सारा दिन गाँव में मटरगस्ती करते ।
    फिर भी उनका डर तो होता ही कि वे कहीं से भी खोज निकालेंगे । वैसे भी इस खोजी दस्ते में ऐसे ही बच्चों को रखा जाता जो खुद स्कूल बंक करने की कला में माहिर होते । वे स्वयं जानते थे कि ऐसे में कहाँ-कहाँ छिपा जा सकता  है । इसलिए नब्बे फीसदी मामलों में वे बच्चों को पकड़ ही लेते ।
    उनसे बचने के लिए हर बार छिपने की नई जगहें और नए उपाय खोजने पड़ते । इसकी योजना पिछली रात को ही बननी शुरू हो जाती कि कैसे क्या करना है । यह अपने में एकदम मौलिक और शोधपरक काम होता था ।
    गाँव से बाहर खेतों में छिपना कोई अच्छा विकल्प नहीं था । पहली बात तो यही कि अकेले खेत में छिपने में डर लगता था और बहुत बोरियत होती थी । दूसरे स्कूल के समय के दौरान अगर कोई खेत की ओर जाते या वहाँ से आते देख ले तो समझो पकड़े गए ।
    तो मैंने छिपने के कुछ नायाब तरीके ढूँढ निकाले । उनमें से एक था घेर (पशुओं के रहने की जगह) की छत की मुंडेर के सहारे लेटकर दिन बिताना । दूसरा था जानवरों के लिए रखे भूसे की अँधेरी कोठरी में भूसा अपने ऊपर करके लेट जाना । ये दोनों ही बहुत नायाब तरीके थे और मैंने इनका किसी से जिक्र भी नहीं किया था । मैं बस्ता लेकर घर से निकलता और रास्ते में पड़ने वाले घेर में चला जाता और सीढ़ियों से होकर छत की मुंडेर के पीछे लेट  जाता । दोपहर होती तो लेटे-लेटे ही बस्ते में रखा खाना खा लेता । स्कूल बंद होने का समय होने पर चुपके से कपड़े झाड़, बस्ता उठा, नीचे उतर घर चला जाता । किसी को शक भी नहीं होता ।
    थोड़ा कष्ट जरूर होता था सारे दिन मुंडेर के पीछे लेटे रहने में । खासकर गर्मी के दिनों में । लेटे-लेटे कमर अकड़ जाती या गर्मी के मारे बुरा हाल हो  जाता । बस एक ही गनीमत थी कि अगली मुंडेर पश्चिम की ओर थी और दोपहर के बारह बजे के बाद वहाँ मुंडेर की छांव आ जाती । साथ ही एक सिरीश का घना पेड़ था जिसकी छांव मुंडेर पर बारह बजे के बाद ही शुरू हो जाती ।
लेकिन यहाँ निश्चिंतता सी रहती क्योंकि घेर में एक तो कोई दिन में आता ही नहीं था और अगर कोई आता भी तो छत पर आने का तो सवाल ही नहीं   था ।
    इस तरह मैंने स्कूल से बंकिंग के स्थान की समस्या को हल कर लिया  था । बस एक ही समस्या थी । हमारे परिवार से दो-तीन और बच्चे मेरी ही क्लास में पढ़ते थे और जाहिर था कि वे मेरे गायब होने की खबर घर में दे सकते थे । इसलिए उन्हें ठीक करना जरूरी था ।
    उनपर कोई एक उपाय काम नहीं कर सकता था । कभी वे पीटने के डर से मानते, कभी लालीपाप वगैरह देना पड़ता । लेकिन कई बार उनकी मुराद पूरी न होने पर वे बता देते तो जवाबदेही करनी होती । जवाबदेही का और क्या रास्ता हो सकता था सिवा उन्हें झूठा साबित करने के । नए बहाने खोजने पड़ते । मैं कह देता कि हैडमास्टर ने मुझे किसी काम से बाहर भेज दिया था । इसपर खूब चख-चख होती ।
 खेत के बीच आरामगाह
    हम चार लड़कों को ताश खेलने की बुरी लत लग गई थी । इसकी शुरूआत कैसे हुई नहीं मालुम । लेकिन छुट्टी के दिन हम चौपाल पर बैठकर सारा दिन ताश खेलते लोगों के पीछे बैठ जाते और गौर से उन्हें खेलते देखते रहते । कई बार उनमें से कोई उठकर पेशाब करने या खाना खाने के लिए जाता तो खेलते हुए अपने ताश हमें थमा देता और हम उसकी बाजी पूरी करते । देखते-देखते हम इतने एक्सपर्ट हो चुके थे कि बड़ों को भी मात दे देते ।
    इस तरह हमें ताश खेलने का चस्का लग गया । वह भी 'स्वीप' के खेल का ।
     इस चस्के में सबसे पहले तो हमने ताश की एक गड्डी खिलाड़ियों की चुराई । कुछ देर ढूँढ मची, चखचख हुई । फिर उन्होंने नई गड्डी खरीद ली । अब सवाल था कि हम अपनी ताश की महफिल कहाँ जमाएं । गाँव में अलग से या औरों के साथ तो संभव नहीं था क्योंकि छोटे बच्चों के लिए ताश खेलने पर मनाही थी ।
    तो किया क्या जाय ? तभी हमने स्कूल से सामूहिक बंक की योजना बनाई । छुट्टी के दिन हम चारों ने गाँव के पास के खेतों का मुआयना किया । तब गैहूं की फसल खड़ी थी । उस समय देशी गैहूं बोया जाता था जिसकी ऊंचाई अधिक होती थी । यानी कि हमारे कद से बड़ी । हम चारों चुपके से खेत के बीच में गए और वहाँ एक गोल दायरे में गैहूं के पौधों को जमीन पर लिटा कर खाली स्थान बना लिया । यह खेत के बीचों-बीच था और खेत काफी बड़ा था । इतना तो निश्चित था कि फसल कटने तक वहाँ कोई आने वाला नहीं था । वह एक सुरक्षित और मजेदार स्थान था । गैहूं के हरियल खेत के बीच पौधों के कार्पेट के ऊपर बैठना या लेटना । गैंहू पकने से पहले तक का मौसम क्योंकि सरदी का ही होता था इसलिए गुलाबी धूप सेंकने का मजा और था ।
    यह लत इतनी बढ़ी कि इसके सामने हमें दुनिया में किसी चीज का होश ही नहीं रहा । सुबह हम वहाँ घुसते तो बस शाम को ही घर लौटते । सारा दिन ताश का खेल चलता ।
    यह सिलसिला अधिक दिन चलने वाला नहीं था । जब हम चारों एक साथ स्कूल से गायब हुए तो सारे स्कूल को आभास हो गया कि हो न हो हम चारों एक साथ कहीं हैं । एक के बाद एक दिन जब यह हुआ तो हैडमास्टर ने इसे पर्सनल चेलैंज की तरह लिया । अगर मामला सहज होता तो दो दिन बाद ही हम चारों के घर खबर भिजवा दी जाती और हमारे घर वाले हमारी मुश्कें बांधकर स्कूल में बोरी की तरह ला पटकते । लेकिन क्योंकि यह मामला मूछ का हो गया था और हैडमास्टर ने समझा कि हमने उसे खुली चुनौती दी है इसलिए वह बिना किसी की सहायता लिए खुद हमसे निपटना चाहता था ।
    उसने अपने भरोसे के तमाम जासूसों को इस काम में लगाया कि वह हमारा पता लगाएँ । वह हमें स्वयं रँगे हाथों पकड़ कर हमारी हैंकड़ी तोड़ना चाहता था । लेकिन हमारी जगह ऐसी नायाब थी और वहाँ पहुँचने की हमारी तरतीबें ऐसी कोडीकॄत कि कोई जासूस उसे भेद नहीं सकता था ।
    इस तरह कई दिनों के घनघोर प्रयासों के बाद उसने हार मान ली । एक दिन जब मैं अपनी दैनंदिन पिकनिक से शाम को घर लौटा तो देखा कि हैडमास्टर ही नहीं, स्कूल के सारे मास्टर और शिकारी लड़कों की सारी फौज हमारे घर के आँगन में जमा थी । हमारे परिवार के भी सब बच्चे, बूढ़े, जवान, आदमी और औरतें वहाँ जुटे थे इस आशा में कि वहाँ कोई मजेदार घटना घटने वाली है । समझने को बचा क्या था । समझ लिया कि बस यही अंत है । चारों तरफ से सवाल-जवाबों की बौछार होने लगी ।
    ऐसे में मौन ही सबसे बड़ा हथियार हो सकता था । मैं इस हथियार को ऐसे संगीन मौकों पर कई बार आजमा चुका था । लोग प्रश्न करते जाते और सामने वाले को मौन देखकर वे पागलों की तरह चीखने लगते । चीखने पर भी जवाब न मिलने पर वे सचमुच उत्तेजना में पागल से हो जाते और या तो गाली बकने लगते या मारपीट पर उतारु हो जाते । इन पागलपन की हरकतों सेड़ा मजा ता । विरोधी की गालियों और मारपीट से भी जब मेरा मुँह नहीं खुलता तो लगता अब वह अपने बाल नोंच लेगा या कपड़े फाड़ लेगा । वह हाँफने लगता और हास्यास्पद होकर या तो वहाँ से चला जाता या बैठ जाता ।
    लेकिन इस वहशीपन और मेरे मौन का परिणाम यह होता कि धीरे-धीरे जनमत आलंबन के प्रति संवेदनशील होने लगता । पहले तो नारी पक्ष खुलकर सामने आ जाता कि ऐसा क्या कोई कत्ल कर दिया इसने कि इस तरह सब उतारु हैं । फिर बूढ़े और बच्चे पक्ष में हो जाते । और पता चल जाता कि विरोधी पक्ष आइसोलेटेड हो चुका है और अब डरने की कोई बात नहीं है ।
    सो उस दिन भी ऐसा ही हुआ । जो बिल्कुल होपलैस सिचुएशन थी वह कुछ ही देर में अपने पक्ष में हो गई । बस कुछ देर तक बेशर्म होकर मौन रहना पड़ा । बाकी सब कुछ वैसे ही हुआ जैसी कि उम्मी थी । जब हैडमास्टर साहब अपने लश्कर को लेकर विदा हुए तो नौबत यहाँ तक पहुँच चुकी थी कि महिलाओं और बच्चों ने तो उनके खुद के काले कारनामे तक गिनाने शुरू कर दिए - चले हैं दूसरे के बच्चे को सबक सिखाने, पहले अपने गरेबां में झांक कर तो देखें ।


 


[ सभी चित्र नैट से साभार ] 
इति प्रथम सर्ग का प्रथम सोपान