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Thursday, 22 January 2015

कुमार अंबुज की कविताओं की एक शाम




[ गोष्ठी रपट, कुमार अंबुज की कविताएं, चित्र “समकालीन तीसरी दुनिया” में प्रकाशित हैं । यहां उद्देश्य इन्हें शेयर करना है ।]

 

नई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में 29 नवंबर को ‘नव सर्वहारा सांस्कृतिक मंच’ द्वारा अंधेरे के विरुद्ध कविता पाठ का आयोजन हुआ। इस अवसर पर एकल कविता पाठ कुमार अंबुज ने किया जिसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध प्रगतिशील आलोचक प्रो- कर्ण सिंह चौहान ने की और संचालन रवीन्द्र के- दास ने किया। 

आरंभिक वक्तव्य शिवमंगल सिद्धांतकर ने दिया। 

फिलिस्तीनी जनता के साथ अंतर्राष्ट्रीय एकता दिवस पर कॉमरेड विनीत तिवारी द्वारा तैयार प्रस्ताव का पाठ आनंद स्वरूप वर्मा ने किया। अंतर्राष्ट्रीय एकता दिवस पर पारित प्रस्ताव में फिलिस्तीनी जनता के न्यायपूर्ण संघर्ष में उनका साथ देने का संकल्प व्यक्त करते हुए ‘दुनिया के तमाम मुल्कों में रह रही अमन और इंसाफ पसंद जनता से, इन मुल्कों की सरकारों से और खुद अपने देश की सरकार से अपील की गयी कि फिलिस्तीनियों के अपने हक की लड़ाई में उनका साथ दें और इज़रायल द्वारा किये जा रहे अमानवीय और बर्बर व्यवहार की निंदा करें।’ कवि कुमार अंबुज ने फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश की एक कविता का पाठ किया। 

अपने आरंभिक वक्तव्य में शिवमंगल सिद्धांतकर ने ‘अंधेरे के विरुद्ध’ कविता पाठ का महत्व रेखांकित करते हुए कहा कि कविता मानवता के कुछेक पर्यायों में से एक है। इसलिए नए फासीवादी अंधेरे के विरुद्ध मानवता के पक्ष में कविता को खड़ा होना होगा। उन्होंने मार्क्स के कथन ‘कविता मनुष्यता की मातृभाषा है’ का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘‘इसीलिए मनुष्यता विरोधी फासीवादी शोषण और दमनकारी अंधेरे के खिलाफ कविता को खड़ा होना होगा। अंधेरे द्वारा पैदा अनेक प्रश्नों का जवाब कोई दर्शन या सिद्धांत दे अथवा न दे किन्तु हर प्रश्न का उत्तर कविता देगी इसलिए कविता को अंधेरे के खिलाफ खड़ा होना होगा। उन्होंने कहा कि आज का नया फासीवाद हिटलर और मुसोलिनी वाला फासीवाद नहीं है, वह विनाशकारी पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के चरम की कोख से पैदा हो रहा है इसलिए हमारी कविता को साम्राज्यवाद के नये युग के चरम के खिलाफ खड़ा होना होगा। इसी उद्देश्य से हमने नव सर्वहारा सांस्कृतिक मंच की ओर से ‘अंधेरे के विरुद्ध’ कविता पाठ का सिलसिला शुरू किया है। हम इस संघर्ष में पुराने शस्त्रगार से प्रासंगिक औजार भी लेंगे और नये औजारों का निर्माण भी करेंगे जिसे किसी गुप्त प्रयोगशाला में निर्मित करने की बजाय खुले तौर पर हम संघर्ष के मैदान में निर्मित करेंगे जो अंधेरे को चीर कर नयी राह बनायेगी। जनतंत्र के नाम पर जिस तरह से सत्ता और संस्कृति पर कब्जा अंधेरी ताकतों द्वारा किया जा रहा है उसमें निश्चित तौर पर विपरीतों का सामंजस्य दिखलाने की कोशिश की जा रही है किंतु सर्वहारा और नव सर्वहारा जनवाद इस सामंजस्य को अंतर्विरोधों के औजार से नेस्तनाबूद करेगा; मौजूदा नई सत्ता जिनके बल पर टिकी हुई है वही उसे उखाड़ फेंकेंगे जिसमें मानवीय आरै मनुष्यता की पक्षधर कविताएं आजै शर बनेंगी और नए फासीवादी शोषणकारी और दमनकारी सत्ता को उलटकर नई सर्वहारा सत्ता के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगी। आप जानते हैं कि सभी वर्ग अलग-अलग अपनी मुक्ति चाहते हैं किंतु सर्वहारा सभी वर्गों की मुक्ति को सुनिश्चित करता है जिसे हमारी कविताएं उजागर करेंगी। इन्हीं शब्दों के साथ मैं संगठन की ओर से इस सिलसिले को जारी रखने का संकल्प दुहराता हूं।’’ 

लगभग एक घंटे तक कवि कुमार अंबुज ने अपनी अनेक चर्चित कविताओं और कुछ हाल की लिखी नयी कविताओं का पाठ किया। 

काव्यपाठ के बाद कवि के साथ कविता पर जीवंत चर्चा हुई।

अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रोफेसर कर्ण सिंह चौहान ने कुमार अंबुज की कविताओं पर बोलते हुए कहा कि रचना में अप्रत्याशित होना आवश्यक है और कुमार अंबुज की कविताओं में अप्रत्याशित चीजें हैं। ऐसा दुहराव इनकी कविता में नहीं है जिसको एक बार पढ़ कर, सुनकर ये धारणा बन जाये कि इस कवि का दायरा ये है रचनात्मकता में, विषय में, शैली में। 

आज के सहित्यिक-सामाजिक हालात पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि कविता को लेकर सवाल अक्सर उठते रहते हैं। ये कहना मुझे कभी सत्य नहीं लगा कि अच्छी कविता की जगह समाज में कम हुई है। कविता की जगह समाज में कम नहीं हुई है। पाठकों का दायरा बढ़ा है, घटा नहीं है। हुआ ये है कि हमने अपना दायरा संकुचित कर लिया है। पाठकों के मन में कवि के लिए जिज्ञासा कम हुई है ऐसा मुझे नहीं लगता है। बार-बार कहा जाता है कि अच्छी आलोचना नहीं हो रही है। ऐसा नहीं है। आलोचना नहीं होती तो मंचीय कविता और इस कविता का फर्क कौन करता। आलोचना है तभी मंचीय कविता और इस कविता में फर्क मौजूद है। तमाम लोकप्रियता के बावजूद मंचीय कविता इस कविता को स्थानापन्न नहीं कर पाई है। 

कविता और साहित्य में आ रहे नये विमर्शों पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि इस देश में जन्म से ही कई तरह के फायदे व्यक्तियों और कवियों को हो जाते हैं। उच्च कुल में पैदा होने, मानव योनि में पैदा होना और मानव में भी पुरुष होना। ये फायदे हैं जो जन्म से हो जाते हैं। लेकिन समय चीजों को तय करता है। केवल कवि ही चीजों को तय नहीं करते हैं। समय के अनुसार समाज में साहित्य का मुहावरा बदला है। समय के मुहावरे के कारण भी बहुत सी चीजें सामने आती हैं। आज मुहावरा बदल चुका है। आज विमर्शों का जमाना है, अस्मिताओं का जमाना है, आज आधुनिक विचारों- चाहे वो मार्क्सवाद का विचार हो, मनोविज्ञान का विचार हो, समाज शास्त्र का विचार हो, इन विचारों को अस्मिताओं ने स्थानापन्न कर दिया है। 

उन्होंने कहा कि नई नई अस्मिताएं आ रही हैं और बहुत सी आने को बेताब हैं। ये अस्मितायें पूरे के पूरे दृष्टिकोण और साहित्य को पुनर्परिभाषित कर रही हैं। एक जमाने में अनुभव की प्रामाणिकता का सवाल मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के बीच से उठा था। लेकिन आज अस्मिताओं ने इस पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। नारी की पीड़ा को आप सहानुभूति दे सकते हैं, संवेदनशील तो हो सकते हैं, हमसफर तो हो सकते हैं लेकिन बिना नारी हुए नारी की पीड़ा को आप नहीं समझ सकते। नारी के द्वारा आने वाली रचनाओं में हो सकता है कि उतना ज्यादा काव्य कौशल न दिखाई दे मगर इन्होंने अपनी जगह बना ली है। कई लोग कहते हैं कि समाजवाद का पराभव हुआ है जिसके कारण कविता में ऐसी चीजें हो रही हैं। मार्क्सवाद से हम अद्भुत चीजें कर सकते थे लेकिन हम मार्क्सवाद को लेकर बैठ गये। समाजवाद का पराभव अगर नहीं हुआ होता तब भी ये चीजें आतीं। मार्क्सवाद कोई केंद्रीय विमर्श में रहने वाली चीज नहीं थी क्योंकि मार्क्सवाद आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से पैदा हुई चीज है जो अस्मिताओं के इस दौर में हाशिये पर चले गये हैं। यह खाली जगहों को समझने की चीज है जिन्हें ये आधुनिक विचार नहीं समझ पाये। 

उन्होंने कहा कि कवि में हेकड़ी अगर रहती और रहे तो कविता होती है। दिक्कत ये है कि कविता एक एक्सट्रा करिकुलर ऐक्टिविटी की तरह हो गयी है। कविता पार्ट टाइम जॉब की तरह हो गयी है। हम कहते कुछ हैं और लिखते कुछ हैं। आज की कविताएं अपने से लड़ने वाली कवितायें है। यह अपराधबोध से पैदा होने वाली कवितायें हैं क्योंकि समाज में मनुष्य के खिलाफ होने वाले अपराधों में हम कहीं न कहीं शामिल हैं। सकारात्मक बोध से उपजी कवितायें नहीं हैं। हमारे व्यवहार में और हमारे विचारों में फर्क है। हम पूंजीवाद को बढ़ावा दे रहे हैं और पूंजीवाद के खिलाफ कवितायें लिख रहे हैं। आते हुए फासीवाद के लिए जिम्मेदार हम हैं, हमारा व्यवहार इसके लिए जिम्मेदार है। अपनी जड़ता को हम अपनी प्रतिबद्धता माने हुए हैं। अब आत्मालोचना करने की आवश्यकता है। हिन्दी भाषा में विमर्श की गुंजाइश नहीं बनी है। हम थोड़े अंधविश्वासी हैं। ये अंधविश्वास केवल भाजपा, आर एस एस, दक्षिणपंथी और भक्त लोगों का नहीं है। हम भी तुलनात्मक रूप से उतने ही अंधविश्वासी और स्वार्थी हैं। अब चीजों पर पुनर्विवेचन करने की जरूरत है।
इस अवसर पर प्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल, पंकज सिंह, सुरेश सलिल, सुमन केशरी, मदन कश्यप, मुकेश मानस, विनीत तिवारी, पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी, शम्भू यादव, अंजू शर्मा, सरिता दास, नित्यानन्द गायेन, आशीष मिश्र, सुलोचना वर्मा, नरेंद्र, विनोद पराशर, रवीन्द्र प्रताप सिंह आदि समेत कई महत्वपूर्ण लोग उपस्थित थे।

रिपोर्ट: नित्यानन्द गायेन और मुकेश मानस / चित्र : राजीव तनेजा



कुमार अंबुज की कुछ कविताएं

क्रूरता

धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगा
प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी
झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा
क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा
एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग
पराजित न होने के लिए नहीं
अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे
तब आएगी क्रूरता
पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी
फिर घटित होगी धर्म-ग्रंथों की व्याख्या में
फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
निरर्थक हो जाएगा विलाप
दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आंसू
पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा
तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को
फिर वह चेहरे पर भी दीखेगी
लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी
सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे
सब अपनी अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता
और सभी में गौरव भाव होगा
वह संस्कृति की तरह आएगी उसका कोई विरोधी न होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी कि किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो
वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी
और सोख लेगी हमारी सारी करुणा
हमारा सारा श्रृंगार
यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना।

किवाड़

ये सिर्फ किवाड़ नहीं हैं
जब ये हिलते हैं
मां हिल जाती है
और चौकस आंखों से
देखती है-‘क्या हुआ?’
मोटी सांकल की
चार कड़ियों में
एक पूरी उमर और स्मृतियां
बंधी हुई हैं
जब सांकल बजती है
बहुत कुछ बज जाता है घर में
इन किवाड़ों पर
चंदा सूरज
और नाग देवता बने हैं
एक विश्वास और सुरक्षा
खुदी हुई है इन पर
इन्हें देखकर हमें
पिता की याद आती है
भैया जब इन्हें
बदलवाने को कहते हैं
मां दहल जाती है
और कई रातों तक पिता
उसके सपनों में आते हैं
ये पुराने हैं लेकिन कमजोर नहीं
इनके दोलन में एक वजनदारी है
ये जब खुलते हैं
एक पूरी दुनिया हमारी तरफ खुलती है
जब ये नहीं होंगे
घर
घर नहीं रहेगा।

तुम्हारी जाति क्या है?

तुम्हारी जाति क्या है कुमार अंबुज?
तुम किस-किस के हाथ का खाना
खा सकते हो
और पी सकते हो किसके हाथ का पानी
चुनाव में देते हो किस समुदाय को वोट
ऑफिस में किस जाति से पुकारते हैं
लोग तुम्हें
जन्मपत्री में लिखा है कौन-सा गोत्र
और कहां ब्याही जाती हैं
तुम्हारे घर की बहन-बेटियां
बताओ अपने धर्म
और वंशावली के बारे में
किस मस्जिद किस मंदिर किस गुरुद्वारे में
किस चर्च में करते हो तुम प्रार्थनाएं
तुम्हारी नहीं तो अपने पिता
अपने बच्चों की जाति बताओ
बताओ कुमार अंबुज
इस बार दंगों में रहोगे किस तरफ
और मारे जाओगे
किसके हाथों?

गांव की याद में एक गीत

चीटियां आओ
कतार में
दहलीज से गुजरो
मुंह में अन्न दबाओ!
गाय आओ
अलस्सुबह रंभाओ
लिपे ओसारे में
लार टपकाओ!
कुत्ता आओ
पंजों से
अपनी रोटी के लिए
किवाड़ बजाओ!
कौआ आओ
सुबह की धूप में
घर की फुनगी पर
पंख खुजलाओ!
पीपल आओ
दुपहरी में
पत्ते हरे-पीले
आंगन में गिराओ
बच्चो आओ
नाक पोंछते
दौड़ गली में
शोर गुंजाओ!

खाना बनातीं स्त्रियां

जब वे बुलबुल थीं उन्होंने खाना बनाया
फिर हिरणी होकर
फिर फूलों की डाली होकर
जब नन्ही दूब भी झूम रही थी हवाओं के साथ
जब सब तरफ फैली हुई थी कुनकुनी धूप
उन्होंने अपने सपनों को गूंधा
हृदयाकाश के तारे तोड़कर डाले
भीतर की कलियों का रस मिलाया
लेकिन आखिर में उन्हें सुनाई दी
थाली फेंकने की आवाज
आपने उन्हें सुंदर कहा तो उन्होंने खाना बनाया
और डायन कहा तब भी
उन्होंने बच्चे को गर्भ में रखकर खाना बनाया
फिर बच्चे को गोद में लेकर
उन्होंने अपने सपनों के ठीक बीच में खाना बनाया
तुम्हारे सपनों में भी वे बनाती रहीं खाना
पहले तन्वंगी थीं तो खाना बनाया
फिर बेडौल होकर
वे समुद्रों से नहाकर लौटीं तो खाना बनाया
सितारों को छूकर आईं तब भी
उन्होंने कई बार सिर्फ एक आलू एक प्याज से
खाना बनाया
और कितनी ही बार सिर्फ अपने सब्र से
दुखती कमर में, चढ़ते बुखार में
बाहर के तूफान में
भीतर की बाढ़ में उन्होंने खाना बनाया
फिर वात्सल्य में भरकर
उन्होंने उमगकर खाना बनाया
आपने उनसे आधी रात में खाना बनवाया
बीस आदमियों का खाना बनवाया
ज्ञात-अज्ञात स्त्रियों का उदाहरण
पेश करते हुए खाना बनवाया
कई बार आंखें दिखाकर
कई बार लात लगाकर
और फिर स्त्रियोचित ठहराकर
आप चीखे-उफ, इतना नमक
और भूल गए उन आंसुओं को
जो जमीन पर गिरने से पहले
गिरते रहे तश्तरियों में, कटोरियों में
कभी उनका पूरा सप्ताह इस खुशी में गुजर गया
कि पिछले बुधवार बिना चीखे-चिल्लाए
खा लिया गया था खाना
कि परसों दो बार वाह-वाह मिली
उस अतिथि का शुक्रिया
जिसने भरपेट खाया और धन्यवाद दिया
और उसका भी जिसने अभिनय के साथ ही सही
हाथ में कौर लेते ही तारीफ की
वे क्लर्क हुईं, अफसर हुईं
उन्होंने फर्राटेदार दौड़ लगाई और सितार बजाया
लेकिन हर बार उनके सामने रख दी गई एक ही कसौटी
अब वे थकान की चट्टान पर पीस रही हैं चटनी
रात की चढ़ाई पर बेल रही हैं रोटियां
उनके गले से, पीठ से
उनके अंधेरों से रिस रहा है पसीना
रेले बह निकले हैं पिंडलियों तक
और वे कह रही हैं यह रोटी लो
यह गरम है
उन्हें सुबह की नींद में खाना बनाना पड़ा
फिर दोपहर की नींद में
फिर रात की नींद में
और फिर नींद की नींद में उन्होंने खाना बनाया
उनके तलुओं में जमा हो गया है खून
झुकने लगी है रीढ़
घुटनों पर दस्तक दे रहा है गठिया
आपने शायद ध्यान नहीं दिया है
पिछले कई दिनों से उन्होंने
बैठकर खाना बनाना शुरू कर दिया है
हालांकि उनसे ठीक तरह से बैठा भी नहीं जाता है।

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