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Sunday, 29 June 2014

काले जुलाहा

काले जुलाहा




इधर हिंदुओं और मुस्लिमों में ऐसे बहुत से सैक्यूलर लोग हो गए हैं जो अपने बच्चों का नाम ऐसा रखने लगे हैं कि यह न मालूम हो कि वे हिन्दू हैं या मुसलमान । ऐसे लोग कुछ बड़े शहरों में हैं और यह करना एक फैशन है । यह उन्हें एक सैक्यूलर ब्रांड बना देता है जिससे बाजार में उनका दाम ऊँचा हो जाता है । इस ब्रांड बनाने के और भी घटक हैं जैसे कुर्ता-पेंट-चप्पल पहनना, हर सभा-गोष्ठी में जाना, हर प्रदर्शन में शामिल होना, कुछ नए किस्म के नाटक और फिल्म देखना, क्लासिकल संगीत सुनना वगैरह-वगैरह । सबको मालूम रहता है कि कौन क्या है, लेकिन फिर भी सैक्यूलर ब्रांड आजकल फैशन है ।
काले नाम भी इसी तरह का है, एकदम सैक्यूलर । उससे यह पता लगाना मुश्किल है कि वह हिन्दू है या मुसलमान । और मजे की बात यह है कि माँ-बाप ने जब यह नाम चुना होगा तो उन्हें दूर तक भी अंदाज नहीं होगा कि सैक्यूलर किस चिड़िया का नाम है । लेकिन यह बाद तक मेरे लिए कुतूहल रहा कि काले हिन्दू है या मुसलमान ।
पेशे के हिसाब से देखें तो उसे मुसलमान होना चाहिए क्योंकि जितने भी कारीगर लोग हैं, सब मुसलमान ही हैं । बढ़ई, लुहार, बर्तन बनाने वाले । इस हिसाब से उसे मुसलमान ही होना चाहिए ।
लेकिन उसमें मुसलमान होने का कोई लक्षण ही नहीं है । वह बाकी के सब किसानों जैसा ही है । उन्हीं के साथ उठता-बैठता है, हुक्का-पानी पीता है, खाना भी खा लेता है । उनके शादी-ब्याह में भी बराबर का शरीक होता है ।
लेकिन कोई दावे से नहीं बता सकता कि वह हिन्दू ही है । तो क्या कबीर ने वाकई जुलाहों को सैक्युलर बना दिया ? इसमें तो संदेह नहीं कि अधिकतर कारीगर जो मुसलमान बने, कुछ पीढ़ियों पहले हिन्दू ही थे  । लेकिन अब तो मुसलमान हैं । यह भी हो सकता है कि जो कारीगर मुसलमान नहीं बने, वे हिन्दू ही रह गए हों । ऐसे बहुत से पेशे अभी भी हैं जिनमें कारीगर हिन्दू भी हैं और मुसलमान भी । मसलन सुनार, नाई और कुम्हार । इसलिए हो सकता है कि काले का परिवार हिन्दू ही हो । काले दो भाई हैं । काले और मंगल । काले खेती-बाड़ी करता है और मंगल जुलाहे का काम । घर में ही एक खड्डी है जिसमें कपड़ा बनता है - खेस, चद्दरें, रजाई के गिलाफ और सूती कपड़ा । कभी-कभार मोटी सूती साड़ियां भी शादी-ब्या के लिए बुन देता है ।
लेकिन अब बुनाई से पेट भरना मुश्किल है । एक चादर बनाने में जितना माल और समय लगता है, शहर-कस्बे के किसी भी बाजार से उससे भी आधे दाम पर चद्दर मिल जायेगी । मंगल पहले तो कहीं से कपास का इंतजाम करता है । यहाँ किसान कपास की खेती नहीं करते इसलिए शहर में महंगे दाम पर खरीद कर लानी पड़ती है । फिर उसकी पत्नी महीनों चर्खे पर सूत कातकर उकी रील बनाती है । उसके बाद मंगल खड्डी पर 8-10 दिन में एक चद्दर बनाता है । उसे शहर जितने दामों पर बेचे तो घर से ही पैसे गंवाने पड़ें । महंगे में कौन खरीदेगा । इसलिए केवल आपस में ही कोई उससे बनवाता और खरीदता है ।
काले ने तो जुलाहे के काम को कभी हाथ भी नहीं लगाया । शुरू से ही खेती करता है । दस बीघा अपनी जमीन है और 5-10 बीघा बड़े किसानों से बटाई पर जोतने-बोने को ले लेता है । घर में दो बैल और एक गाय हैं । शादी नहीं की है इसलिए खुद ही पशुओं का चारा-पानी करता है । खाना अलबत्ता छोटे भाई की पत्नी बना देती है । काले का घर गाँव के धुर पश्चिम में है और उसके खेत पूरब  में ।
किसानों को जुलाई-बुवाई के दिनों में सूरज निकलने से पहले ही हल-बैल लेकर निकलना होता है । सूरज निकलने के बाद जब तक नाश्ते का समय होता है तब तक हलवाहे एक बीघा जमीन जोत चुके होते हैं । तभी घर से औरतें नाश्ता और छाछ ले खेत में पहुँच जाती हैं । हलवाहे बैलों को पेड़ के नीचे बाँध खुद भी छाँव में बैठकर नाश्ता कर फिर दोपहर तक काम में जुटते हैं ।
काले भी सुबह ही हल कंधे पर रख बैलों को ले निकलता है । लेकिन दस में से पाँच दिन खेत तक पहुँचता ही नहीं । होता यों है कि काले को सारा गाँव पार कर खेत में जाना होता है । रास्ते में कई बैठकें हैं जहाँ वे किसान अक्सर हुक्का गुड़गुड़ाते रहते हैं जिन्हें खेत में जाना नहीं है । जैसे ही काले की `राम-राम' सुनी कि कहा नहीं -
"अरे काले, क्या रात में ही हल जोड़ दोगे । अभी तो बहुत वक्त पड़ा है । आओ, दो घूँट मारकर जाना ।"
"चलने दो । एक बार बैठ गया तो फिर उठा नहीं जायेगा ।"
" बड़े कामकाजी हो गये हो भई जो दो घूँट हुक्का पीने की भी फुरसत   नहीं । अरे पानी से ठंडा कर नए तंबाकू से चिलम भरी है । सुबह-सुबह क्यों हुक्के का अपमान करते हो ।"
"चलो कहते हो तो दो घूँट मार ही लूं ।"
और इस तरह काले हल को बैठक की दीवार से टिका, बैलों को पेड़ के नीचे बांध हुक्का में दम लगाने बैठ ही जाता है । उन्हें देख आस-पास के दो-चार और लोगों को इकट्ठा होते क्या देर लगती है । बैठक जम जाती है तो बातों का सिलसिला ऐसा जमता है कि समय का पता ही नहीं चलता ।
पूरब में पौ फट रही है, पेड़ों पर पक्षी चहचहा रहे हैं, सुबह की ठंडी-ठंडी बयार चल रही है और ऊपर से ताजे भरे हुक्के की महक वातावरण में मादकता घोल रही है । कौन किसान इस सम्मोहन को काट सकता है । और उसमें भी काले जैसा बातून और बैठक बाज । एक बार बैठ गया तो घंटों उठने का नाम नहीं लेगा । और जब तक होश आए तब तक सूरज चढ़ चुका होता है । यह कोई खेत में जाने का वक्त नहीं है । और अक्सर यह होता है कि वह बैठक से ही हल-बैल ले घर वापस आ जाता है ।
वैसे घर में यह पूछने वाला कौन है कि वापस क्यों आ गए । हल एक तरफ टिकाया, बैल बाँधे और फिर चल पड़े बैठकों पर गप्पबाजी करने । काले की जिंदगी इसी तरह गुजरती है ।
ऐसा नहीं है कि खेती करता ही नहीं । करता है । बहुत मेहनती है । लोग जब उलाहना देने लगते हैं कि देखो काले, अब गेहूं की बुवाई में पिछड़ जाओगे, अगर खेत में दो बार हल नहीं लगाया तो । यह काले के लिए आपातकाल जैसा होता है । अब वह रात में हल लेकर निकलता है और जब सब लोग सो रहे होते हैं तब वह हल जोत रहा होता है ।
रात में हल चलाने का कुछ और ही मजा है । चांदनी रात होती है, ठंडी ताजा हवा होती है, चारों तरफ शांति होती है । ऐसे में न बैलों को थकान होती है न हलवाहे को । पता नहीं यह दिन में हल चलाने, कटाई, बुवाई, सिंचाई, फसल गहाई का सिस्टम क्यों है । किसान के अस्सी पर्सेंट काम तो गर्मी के मौसम में ही होते हैं । जेठ की कड़ी धूप पड़ रही है, लू चल रही है, आसमान से आग टपक रही है और जमीन से गर्म भभूखे उठ रहे हैं । ऐसे में किसान हल जोत रहा है या खलिहान में दाँय चला रहा है । बैल भी हलकान होते हैं, खुद भी, परिवार के लोग भी और सहायक लोग भी । काले की समझ में यह कभी नहीं आया कि जब वही सब काम रात की ठंडी बयार में आराम से किए जा सकते हैं तो दिन में ही करने की जिद क्यों है ।
जो भी हो काले को रात में काम करने में बहुत मजा आता है । सारी दुनिया सोई है, सारा जंगल सोया है । केवल काले और उसके बैलों के चलने, हल की फाल से फटती धरती के दरकने की आवाज आ रही है । ऐसे लगता है कि सब किसी दूसरे लो में घट रहा है । जैसे घने कोहरे में चलता आदमी सब कुछ से कट जाता है और लगता है कि सृष्टि में वही एक है और उसके इर्द-गिर्द दो गज की यह जमीन । बाकी कुछ है ही नहीं ।
यही कारण है कि जिस काम को करने में किसान दस दिन का समय लेते हैं, काले उसे आधे समय में ही निपटा लेता है ।
यह आम चलन के विरुद्ध है, इसलिए सारा गाँव उसे अमंगल सूचक मानता है । लोगबाग खुले आम भी काले से शिकायत करते हैं कि ऐसा न करे, यह अच्छी बात नहीं है । लेकिन काले अपनी मर्जी का इन्सान है । सब बातों को हँसी में टाल देता है ।
वैसे ऐसा कभी नहीं हुआ कि औरों की फसल अच्छी हुई हो और अमंगल के कारण काले की खराब । अच्छी है तो सबकी है, सूखा है तो सबके लिए है, ओला-पानी है तो सबके लिए है । इसलिए जब अमंगल को सिद्ध करने को लोगों को कुछ और नहीं मिला तो अब वे प्राकृतिक आपदाओं का इल्जाम उसके सिर मढ़ने लगे । सूखा पड़े, बाढ़ आ जा, ओले या तेज बारिश हो जाय, कोई बीमारी फैल जाय, सब काले का नाम लेने लगे हैं । इससे काले पर दबाव बढ़ता जा रहा है ।
वह बहुत समझा चुका है कि ये विपदाएँ केवल इस गाँव पर नहीं आईं, पूरे इलाके पर आई हैं । और फिर सारी दुनिया में कहीं-न-कहीं हर दिन कोई-न-कोई विपदा तो आई ही रहती है । तो इस सबका जिम्मेदार क्या काले है ? हैं, जवाब दो ।
जवाब चाहे कोई न दे, लेकिन अंदर से माने हुए हैं कि इस गाँव की विपदाओं के मूल में कहीं काले ही है । दरअसल आदमी अपने को तभी तो उचित ठहरा सकता है जब अपने विरोध में चलते को गलत ठहरा सके । और यहाँ तो सामूहिक सहीपन का सवाल है । आखिर हजारों साल से दादा-परदादा जिस लीक पर चलते रहे, वह क्या गलत थी ! अगर वह गलत सिद्ध हो गई तो इन सैंकड़ों पीढ़ियों का पूरा जीवन, पूरा आचरण, पूरी मान्यताएं, संस्कृति और परंपराएँ सब गलत, झूठ और पाखंड पर टिकी सिद्ध हो जाएँगी । वही क्यों, आज जो उन पर चल रहे हैं उनका क्या होगा । इसलिए काले को राह पर लाना जरूरी है । वह सबके सामने लगा एक प्रश्न चिन्ह है ।
लोगों ने पंचायत बुलाई और काले को समाज-विरोधी आचरण के लिए लताड़ा । जुर्माना भी किया और हिदायत दी कि अगर अब आगे से अपने को नहीं बदला तो समझ ले सारा गाँव उसका दुश्मन है । बहिष्कार होगा ।
काले जैसा मिलनसार आदमी और कुछ सह ले, बहिष्कार कैसे झेलेगा । लोगों से मिलना-जुलना, हँसी-ठट्ठा करना, उनकी हारी-बीमारी और मुसीबत में साथ खड़ा होना, यही तो उसकी जिंदगी है । किसी पर जरा सी विपदा आ जाय, काले अपने को, अपने कामकाज और घर को भूल तब तक वहाँ से नहीं हिलता जब तक विपदा टल नहीं जाय । वह हफ्तों तक बीमार पड़े लोगों के बिस्तर के साथ बैठ बिना सोये तीमारदारी में जागा है । गिरे घर को बनवाने में हफ्तों जुटा रहा है । लोगों की शादियों के सारे काम अपने जिम्मे ले रात-दिन पिला रहा है ।
गाँव में ऐसा कोई घर नहीं जो उसके अहसान तले न दबा हो । और यह इतनी सी बात को लेकर पूरा गाँव उसका दुश्मन बन रहा है । उसने किसी का क्या बिगाड़ा है । यह फैसला लेते किसी ने एक मिनट भी नहीं सोचा । दूध में मक्खी की तरह निकाल फेंक दिया ।
काले कई दिनों तक घर से निकला ही नहीं । छोटे भाई की पत्नी जो खाना दे जाती, वह खा लेता और फिर कोठरी में चारपाई पर लेटा छत ताकता रहता । सोचता रहता, जिस काम को करने से कोई यश न मिले उसे करना क्या । जिस गाँव में भलाई के बदले बुराई मिले उसमें रहना क्या । जो लोग बरसों के संबंध को यूँ ठुकरा दें उनसे मिलना-जुलना क्या ।
अभी तक जीवन का जो अर्थ वह समझा था, अचानक उसकी आँख के सामने टूट कर गिर गया । कोई नया अर्थ दूर तक दिखाई नहीं पड़ रहा था जो जीवन को सहारा दे सके । कई दिन बीत गए । काले का ऊँचा स्वर और अनुपस्थिति जब सबको खलने लगी तो एक-एक कर सब आने लगे समझाने ।
"अरे काले, ऐसी भी क्या जिद । जब सब कह रहे हैं तो मान भी जाओ । तुम्हारी भलाई की तो कह रहे हैं ।"
काले कोई जवाब नहीं देता । फिर उसने एक दिन बाहर के गाँव के एक किसान के हाथ बैलों को बेच दिया । एक दूर के गाँव के बड़े किसान के साथ खेतों का सौदा कर लिया । फिर एक रात अपना झोला-पोटली लेकर कहीं निकल गया ।
कई साल हो गए कोई खबर नहीं कि कहाँ गया । गाँव के लोग आह भरते हैं कि यह गाँव अभागा है जो उसने अपनी मूर्खता में ऐसे अनमोल हीरे को खो दिया है । ऐसे लोग सदियों में एकाध होते हैं गाँव में ।


Thursday, 26 June 2014

दो बैलों की कथा

दो बैलों की कथा 




    अजीब से दो नाम । पप्पड़ और काना । पता नहीं किसने इन बैलों का यह नामकरण किया होगा । यह भी नहीं मालुम कि जानवर अपने बच्चों का नाम रखते भी हैं या नहीं । हो सकता है वे नाम रखते हों । यह भी हो सकता है कि वे अपने बच्चों को किसी ज्ञानेंद्री के माध्यम से ही पहचान लेते हों । मसलन कुछ आँख से,कुछ गंध से या ऐसे ही अन्य से ।
नाम अगर देते भी होंगे तो उसे जानने का हमारे पास कोई साधन नहीं है । क्योंकि अपनी जिस भाषा में वे एक दूसरे को पुकारते हैं उसे हमारे लिए समझना मुश्किल है । उनके पास पहचानने का यह साधन अवश्य है क्योंकि जब हमें कोई हमारे नाम से बुलाता है तो हमारे संपर्क में रहने वाले पशु इस बात को जानते हैं कि यह नामधारी कौन है । इतना ही नहीं, हम जब उनका भी अपनी भाषा में कोई मनमाना नाम रख लेते हैं तो वे उसे भी जान जाते हैं । उस नाम से बुलाने पर दौड़े चले आते हैं या कान खड़े करके जताते हैं या पूंछ हिलाकर ।
लेकिन इस मामले में हम बहुत पिछड़े हैं । हर मामले में जिस तरह से हम आगे हैं उससे तो नहीं लगता कि हम इसको समझने की क्षमता ही नहीं रखते । मैंने देखा है कि शोध का लक्ष्य बनाने पर लोग पशुओं और पक्षियों की भाषा के काफी कुछ का `डिकोडीकरण' कर लेते हैं । हम चाहें तो उनके असली नामों को जान सकते हैं । लगता है हममें जानने की कोई उत्सुकता नहीं है । यानी हम उनकी दुनिया को कोई महत्व नहीं देते,बस अपनी दुनिया को देते हैं और अपनी दुनिया के सब नियम उन पर लागू करते हैं ।
काना नाम इसलिए नहीं रखा गया होगा कि वह एक आँख का है बल्कि इसलिए कि ज्यादातर वह एक आँख बंद रखता था । वैसे भी वह थोड़ा गर्म मिजाज का था और जिसे भी देखता तिरछी नजर से देखता । पप्पड़ बहुत ही मोटा-ताजा मस्तमौला सा था । काम भी जरा सुस्ती से ही करता चाहे आप जितना चिल्लाएं । देखने में उसकी चमड़ी भी काफी मोटी दिखाई देती । इस सब को नाम के अर्थ में लाने के लिए उसका पप्पड़ नाम रखा गया । अब जरा इनका रूप-वर्णन भी कर लिया जाय ।
काने का रंग कुछ नीलापन लिए हुए था जैसे सरदी में ठिठुरे बछड़े का हो जाता है । वह सुंते बदन का था । सींग भी दोनों ओर को सीधे निकले हुए । आँखें भी उसकी कुछ नीली ही थीं और वह सामने से नहीं देखता था । पप्पड़ झक्क सफेद रंग का । बड़ी बड़ी आँखें । स्वस्थ और सुडौल । सींग नपे-तुले गोलाई  में । दोनों का स्वभाव एकदम विपरीत । काने को जरा सा कुछ कह दें तो रस्सी तुड़ा कर भाग खड़ा होने को उद्यत ।
पप्पड़ को चाहे जितना कह लो, पूंछ मरोड़ लो, पैना मार लो लेकिन करेगा सब काम उसी गति से जिससे उसे करना है । इससे हर काम में असंतुलन बना रहता । गाड़ी में दोनों को जोत दो तो काना हमेशा ही एक कदम आगे चलता और इसलिए बार-बार पहिया लीक काटता । हल में जोतने पर भी यही हाल । कभी भी लकीर सीधी नहीं बन पाती और अक्सर ही पांव में फाल लगने का खतरा बना रहता ।
स्वभाव में इतनी भिन्नता के बावजूद उनमें गहरी आत्मीयता थी । एक दूसरे के प्रति गहरी संवेदनशीलता । इसका पता तब चलता जब दोनों खाना खाते या दोनों में से किसी की तबीयत खराब होती ।
अक्सर तो यही माना जाता है कि जानवर खाने में बहुत ही लालची और स्वार्थी होते हैं । लेकिन उनमें यह कभी देखने को नहीं मिला । काम से लौटने के बाद हालाँकि भूख तो दोनों को खूब लगी होती लेकिन चारा डालने के बाद दोनों अपनी तरफ से खाना शुरू करते और अपना हिस्सा खत्म हो जाने पर अलग हो जाते । दूसरे की ओर का खाना खाने का प्रयास नहीं करते । उसी तरह अगर कभी दोनों में से कोई बीमार हो जाता तो दूसरा उस पूरे समय उदास रहता । काम से बीच में छुट्टी के समय वे एक-दूसरे को चाटते या खुजलाते । काम से शाम को वापस लौटते समय दोनों रास्ते में आगे-पीछे एक साथ चलते ।
वे परिवार के सदस्यों की तरह थे और परिवार के अंदर की सब बातों की जानकारी उन्हें अनायास ही हो जाती । मैं हालाँकि शहर में रहता था लेकिन जब भी छुट्टी में आता तो वे जान जाते कि मैं परिवार का ही सदस्य हूं और घर में मेरी स्थिति क्या है । इसलिए जब मैं शौक के लिए उन्हें हल में जोत कर खेत में ले जाता तो वे मेरे अनाड़ीपन को ध्यान में रखते सब काम करते । लगता था वे परिवार के बच्चों तक को पहचानते थे । इसीलिए बहुत लोगों के बीच भी परिवार के सदस्यों को देख लेते और मौका लगा तो उनके पास आ जाते ।
उनमें गजब का अनुशासन और सहजबुद्धि थी । घर से बाहर निकलते ही वे जान जाते कि आज उन्हें किस दिशा के खेत में किस काम पर जाना है । खेत गाँव के पास भी थे और दूर भी ।
    निरा समर्पण असंभव सी चीज है । भगवद् भक्ति में भी यहाँ से वहाँ तक स्वार्थ ही लिसा होता है । और नहीं तो मुक्ति या मोक्ष का ही । लेकिन ये दो प्राणी थे कि सारे परिवार का भार अपने सिर उठाए हुए थे, बदले में कुछ भी पाने की आशा के बिना । पूरे दिन के काम के बाद जो रुखा सूखा मिल गया सो खा लिया । कभी शिकायत नहीं की, गिला-शिकवा नहीं किया । और परिवार के हर सदस्य से प्रेम ऐसा भरपूर कि कोई अबोध बच्चा भी गलती से सामने आ जाय तो मजाल कि उसे कोई खरोंच भी लग जाय ।
ऐसा नहीं कि परिवार उनसे केवल काम ही लेता था । खूब स्नेह भी करते सब लोग । सब लोग उन्हें परिवार की बातचीत में वैसे ही शामिल करते जैसे मनुष्य जीवधारियों को । खेत पर काम करने वालों के लिए जब कलेवा या भोजन घर से जाता तो दोनों के लिए अलग से रोटी और गुड़ की डली खास तौर पर जाती । शाम को काम से घर लौटने पर या तो माँ या कोई और महिला चारा डालने के साथ उनके पूरे शरीर पर हाथ फेरती जिससे कि दिन भर की थकान मिट जाय । बच्चे तो उनसे इतने हिल मिल गए थे कि सींग पकड़ कर लटक जाते । काना भले ही नाक पर मक्खी नहीं बैठने देता लेकिन मजाल है कि किसी बच्चे को कभी झिड़का हो । परस्पर के इस प्रेम और साथ में लगता ही नहीं था कि कभी एक दूसरे को विदा कहने का वक्त भी होगा ।
लेकिन सॄष्टि के नियमों को भला कोई पार कर सका है ? बैलों को तो मनुष्य से पहले जाना ही है । किसे पता था कि यह जाना इतना आकस्मिक और आमूल होगा ।
हुआ यह कि कई साल तक इलाके में सूखा पड़ा । अकाल की नौबत आ गई । लोग अनाज तक के लिए तरस गए । उन दिनों सरकारी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिए ऐसी व्यवस्था बना कर रखी गई थी कि एक राज्य से अनाज दूसरे राज्य में न जा पाए । यानी एक राज्य में अनाज का भंडार हो और दूसरा भूखा मरे । इससे बड़े व्यापारियों को राजनेताओं के आशीर्वाद से चोरी-छिपे एक जगह से सस्ते में खरीद दूसरी जगह मंहगा बेच मुनाफा कमाने की खुली छूट मिली हुई थी । यह धंधा खूब फल फूल रहा था ।
देखा-देखी कुछ बड़े किसान भी रात-बेरात पड़ोसी राज्य से गाड़ी भरकर अनाज लाते और चुंगी पर रिश्वत दे रात में ही घर ले आते । पूरी रात में 20-25 मील का फासला तय करना होता इसलिए एक तो गाड़ी लबालब भर लेते और दूसरे बैलों को लगभग दौड़ाते लाते ।
ऐसी ही वह रात रही । गाड़ी गैहूं की बोरियों से पूरी भरी थी । क्षमता से ड्यौढ़ी । लंबा फासला तय करना था इसलिए काना और पप्पड़ को सारा रास्ता भागकर पार करना था ।
पौ फटने वाली थी कि गाड़ी गाँव के सिवान पर पहुंची । वहाँ एक सीधी खड़ी चढ़ाई पड़ती थी । वैसे तो चढ़ाई से पहले बैलों को साँस लेने का मौका देकर फिर चढ़ाई चढ़ी जाती थी । लेकिन उस दिन देर कुछ ज्यादा ही हो गई थी इसलिए बिना आराम दिए सीधे ही चढ़ाई पर गाड़ी को चढ़ा दिया ।
    काना और पप्पड़ दोनों पूरे रास्ते भाग-भागकर पहले ही हाँफे हुए थे । छातियाँ जोर-जोर से धड़क रही थीं । पंखा उखड़ा हुआ था । कि चढ़ाई पर गाड़ी ऊपर जाकर रूक गई । बड़ी अजीब स्थिति थी । अगर गाड़ी उस अंतिम उभार को पार नहीं कर पाई और रुक गई तो जाहिर था कि वह वापस नीचे की ओर गिरेगी और अनाज या गाड़ी का तो जो होगा सो होगा बैल भी दोनों जाएँगे ।
    पल भर में ही तय होना था कि सबका हस्र क्या होगा । इस विपदा से बच निकलने का केवल एक ही चारा था कि दोनों बैल किसी तरह गाड़ी को चढ़ाकर उस पार ले जाएँ । जो उन परिस्थितियों में तो असंभव ही था । बैलों की साँस उखड़ी थी और वे लंबे सफर की भागमभाग से बेदम थे । गाड़ी वजन से इतनी भारी थी कि इतनी ऊंची चढ़ाई पर उसे ले जाना असंभव था ।
गाड़ीवान के साथ बैल भी इस परिस्थिति को समझ रहे थे और तौल रहे   थे । कि काने ने पूरा जोर लगा गाड़ी का अपनी ओर का पहिया ऊपर निकाल दिया । वह निकला तो पप्पड़ ने अपनी ओर का पहिया भी निकाल दिया ।
    गाड़ी तो ऊपर चढ़ गई लेकिन काना वहीं धड़ाम से गिर पड़ा और गिरते ही उसके प्राण पखेरू उड़ गए । घर तक खबर पहुंची तो वहाँ कुहराम मच गया । पूरा गाँव एकत्रित हो गया ।
पूरे कायदे से उसकी अंत्येष्ठि की गई ।
 उसके बाद से पप्पड़ ने भी जीना छोड़ दिया । वह न कुछ खाता, न पीता, न किसी चीज में कोई रुचि ही दिखाता । लगता उसने सबको पहचानना भी छोड़ दिया है । उसके मन को बहलाने के बहुत प्रयास किए लेकिन सब  बेकार ।
    और लगभग दस दिन बाद पप्पड़ ने भी परिवार और इस दुनिया से विदा ली ।


Friday, 20 June 2014

बल्लू कुम्हार उर्फ तड़ीपार विशेषज्ञ

बल्लू कुम्हार उर्फ तड़ीपार विशेषज्ञ

 [ पिछले दिनों एक कहानी लिखकर समाप्त की । मेरे लिए कहानी लिखना रचनात्मक कर्म तो है ही ग्रामीण जीवन की के जीवंत पात्रों की स्मृतियों को सजीव कर उऋण होना भी है ।]


बल्लू कुम्हार था । गाँव में कुम्हारों के दो घर थे आसपास । घरों में कमरे तो एक-एक ही थे कच्चे लेकिन आँगन कुछ बड़ा था । घर की दीवारें ऊँची थीं इसलिए मालूम नहीं चलता था कि अंदर क्या होता है । हाँ घर के आँगन की दीवार के दोनों ओर मिट्टी के टूटे बर्तनों के ढेर लगे रहते थे । भीतर से कई बार कुम्हार रेहड़ी पर बर्तन रख गाँव में या पेंठ के लिए निकलते थे । इससे मालूम होता था कि घर के अंदर मिट्टी के बर्तन बनते हैं ।
बल्लू का संबंध भी इन्हीं दो घरो में से एक से था । हालाँकि उसे न तो कभी बर्तन ले जाते देखा, न बनाते । वह जाति का ही कुम्हार था काम उसका कुछ और था ।
सब जानते थे कि बल्लू भैंस, गाय, बैल वगैरह को एक गाँव से दूसरे में ले जाने का विशेषज्ञ है । गाँव में कोई ऐसा घर नहीं जिसको बल्लू से काम न पड़ता हो । किसी को दूर ब्याही अपनी लड़की के घर गाय या भैंस भिजवानी है । किसी को मायके में । किसी ने गाय, भैंस, बैल बेचे हैं तो खरीदार के गाँव भिजवाना   है । किसी ने किसी दूसरे गाँव से पशु खरीदा है और उसे यहाँ मंगवाना है ।
इस तरह बल्लू को हर दिन कहीं-न-कहीं से बुलावा आ ही जाता है । इस गाँव में ही नहीं, आस-पास के गाँवों में भी उसकी प्रसिद्धि थी इसलिए वहाँ से भी बुलावा आता रहता । फिर दूर-दराज के जिन गाँवों में वह पशु छोड़कर आता, वहाँ से भी उसके लिए माँग आती रहती ।
इसलिए बल्लू हमेशा बुक रहता । कभी-कभी तो ऐसा भी होता कि उसकी अगले कई महीनों तक एडवांस बुकिंग हुई रहती । लोग कहाँ इतना इंतजार करते । बहुत खरी-खोटी सुनाते । बात का सिलसिला कुछ यों शुरू होता -
" बल्लू" बैठक की चारपाई पर हुक्के का दम लगा रामचरण बोलता ।
"जी माई-बाप" चारपाई से लगी बैठक की सपील पर नीचे बैठा बल्लू हाथ जोड़ दवाब देता ।
" देखो छोटी बिटिया की गाय पिछले महीने लात गई है । छोटे-छोटे बच्चे  हैं । न किसी को दूध मिल रहा है, न छाछ । सब हलकान हो रहे हैं । सूखे टिक्कड़ चबाने पड़ रहे हैं । ऐसा करो कि धौली गाय को वहाँ छोड़ आओ ।"
"जी हुजूर, जैसा हुकुम ।"
"तो कल सुबह-सुबह निकलना होगा । 20 कोस की दूरी है । दो दिन तो पहुँचने में ही लग जाएँगे ।"
"जी कल तो रामलाल की गाय ले जानी है और बाद में बीस दिन तक गाँव में वायदा किया हुआ है । लेकिन फिकर मत करो । समझो बिटिया के घर गाय पहुँच गई ।"
" पहुँच गई के बच्चे, टामे मत पिला । 10 दिन बाद तो गाय बच्चा जन देगी । फिर क्या सिर पर रख ले जाएगा पाड़े को ।"
"अब जैसे भी ले जाऊँ । जिम्मेदारी तो मेरी है ।"
बहुत कहा-सुनी होती । बल्लू को बहुत आरोप झेलने पड़ते । सब जानते थे कि झूठ नहीं बोल रहा है लेकिन फिर भी आरोप लगाते कि जानबूझकर टरका रहा है, कि उसका दिमाग चढ़ गया है और किसी को कुछ समझता नहीं है । कि हमेशा वह उन्हीं के काम को लेकर आनाकानी करता है, दूसरों का काम तो तुरंत कर देता है ।
इस तरह रोज ही तुक्का-फजीहत होती । बड़े लोग आँखें भी दिखाते, धमकियाँ भी देते । लेकिन बल्लू ने कुछ नियम बना रखे थे । उनमें से सबसे पहला यह था कि जिसने काम के लिए पहले कहा है, उसका काम पहले करना  है । इस तरह क्रम में जिसने जब कहा, उसी क्रम में उसका काम होगा । बड़ा हो या छोटा । पढ़ा-लिखा तो था नहीं, लेकिन पूरे 365 दिन की बुकिंग भी हो तो भी उसे क्रम याद रहता था जैसे कम्प्यूटर में होता है ।
इसमें न कोई नवाबी काम करती, न धमकी । हाँ इस बात की गारंटी थी कि जब नंबर आएगा तो बल्लू पहली रात को घर आकर सूचना दे देगा कि कल सुबह ले जाना है । रात को रास्ते के लिए चना-चबैना वगैरह का इंतजाम भी करना होता ।
लोग देरी से कुपित होते, लेकिन कोई उपाय नहीं था । बल्लू टस-से-मस होने वाला नहीं था ।

अपने काम में वह माहिर था । ऊपर से लगता है कि ह कोई मुश्किल काम नहीं लेकिन काम की गहराई में जाएँ तो पता लगे कि दुनिया में इससे मुश्किल कोई काम नहीं हो सकता ।
पशु बेजुबान जरूर हैं लेकिन उनमें सोचने-समझने की क्षमता खूब है । बेजुबान भी नहीं हैं क्योंकि आपस में उनका संवाद तो चलता ही रहता है ।
बल्लू भी उनकी भाषा से अच्छी तरह परिचित हो गया था । वह जानता था कि कोई पशु अपने घर और मालिक से जुदा होते समय कैसी दुखभरी आवाज निकालता है । कैसे अपने बच्चों, भाई-बहनों, माँ वगैरह से बिछुड़ने पर करुण रोदन करता है । उसकी भूख-प्यास की भाषा क्या होती है । यह वह अच्छी तरह समझता था । लेकिन उनके भावात्मक दुख में उनकी किसी भी तरह की मदद कैसे करता ? उसे तो हुक्म का पालन करना है । यही उसकी जीविका भी थी ।
जीविका से ज्यादा शायद शौक था ।
कोई मन को पढ़ना जानता तो जान लेता कि उसके मन में पशुओं के लिए कितना प्यार और ममता भरी थी । उसके जीवन का अधिकांश समय उन्हीं की संगति में बीतता ।
मनुष्य समाज में उसे या तो अपने स्वार्थ या काम करवाने को बेताब लोग मिलते, उसे धमकाते हुए, प्रताड़ित करते हुए । घर में भी उसका शायद कोई नहीं था । जो भाई-बंद थे उनका उससे वास्ता इतना भर था कि जब काम निपटा कर वह मिले पैसे या अनाज वगैरह लेकर घर लौटता तो उसे हस्तगत कर लेते । हालाँकि उसे याद नहीं पड़ता कि कभी वह किसी एक पूरी रात भी घर में सोया हो या वहाँ खाना खाया  हो । ज्यादातर समय रास्ते में पशुओं के साथ ही गुजरता और बाहर ही खाता-पीता ।
इसलिए पशु ही उसके एक तरह से सच्चे साथी थे ।
उसके काम की वास्तविकता में किसी की दिलचस्पी नहीं थी । किसी के लिए यह मसला सोच-विचार का विषय नहीं था कि एक पशु को अपने घर और सगे-संबंधियों से काटकर ले जाना कितना मुश्किल और कई बार तो जोखिम भरा काम था । पशु कोई ऐसा बातचीत, संवाद करने वाला प्राणी तो है नहीं कि आप उसे बता दें कि कहाँ ले जा रहे हैं और क्यों ले जा रहे हैं । यह बता दें कि जहाँ भी ले जाएँगे, वहीं उसे वह सब मिलेगा जो यहाँ मिल रहा है । इसलिए वह जी जान से विरोध करेगा और जरूरी लगा तो ले जाने वाले को मार बैठेगा या रस्सा छुड़ाकर भाग लेगा । भागे हुए पशु को पकड़ना संभव नहीं । वह तो घर आकर ही दम लेगा ।
ऐसे वाकये कई बार हो चुके थे कि जब कई दिनों की मेहनत के बाद बल्लू कोसों का रास्ता पार कर गन्तव्य पर पहुँचने वाला होता और जरा सी चूक से पशु छूट निकलता । पूरे करे-कराये पर पानी फिर  जाता । उसे वापस लौटकर पूरी कवायद फिर से करनी होती ।
उसका काम एक विज्ञान भी था और कला भी ।
लेकिन किसी की दिलचस्पी इसमें नहीं थी कि आखिर वह कैसे इस काम को अंजाम देता है । काम हो गया, बस यही काफी था । लेकिन बल्लू के लिए हर पशु अपने आप में एक व्यक्तिगत मामला था । वह आसपास के गाँव के सब पशुओं को उनके नाम से तो जानता ही था, उनके गुण-अवगुण का भी जानकार   था । हर पशु का निजी इतिहास भी थोड़ा जानता था जो उनके स्वभाव, आचरण, व्यवहार पर रोशनी डालता था ।
अगर किसी गाय या भेंस ने अभी बच्चे को जन्म दिया है तो उसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाना अन्य की तुलना में सरल था । अगर बच्चा बहुत छोटा होता तो बल्लू उसे अपने कंधे पर रखकर चल पड़ता और गाय या भैंस पूरा रास्ता उसके पीछे चली चलती । बछड़े को भागने से कुछ लेना-देना ही नहीं । ज्यादा-से-ज्यादा यहाँ-वहाँ उछल-कूद कर लेगा । इस तरह बच्चे के मोह में बँधी गाय या भैंस दुख से रंभाती हुई भी चली जाती । बस एक ही मुश्किल थी यदि बच्चा थोड़ा बड़ा हो गया होता । क्योंकि तब न तो उसे कंधे पर बिठाया जा सकता था और न उसे तेज चलाया जा सकता था । ऐसे में पाँच-दस कोस का रास्ता भी कई दिन ले लेता ।
लेकिन बिना बच्चे वाली गाय या भैंस को ले जाना उतना आसान नहीं था । वे भाग निकलने की हर संभव कोशिश करते और जरा गलती हुई नहीं कि हाथ से छूटे नहीं । इनमें भी गाय ज्यादा चालाक होती । भैंस तो फिर भी मन मारकर चलती रहती । छूटकर भाग भी लेती तो थोड़ी दूर में ही हाँफ जाती और पकड़ी जाती । लेकिन गाय एक बार छूटी तो समझो कि गई । इसलिए बल्लू ऐसी भगोड़ी गायों पर नियंत्रण रखने के लिए उनके गले में रस्सी से एक भारी लकड़ी का बोझ लटका देता । जब तक वे आराम से पीछे चलती रहतीं तब तक तो   ठीक । लेकिन अगर वे छूटकर भागने की कोशिश करें तो यह लकड़ी का टुकड़ा उनके घुटनों पर सीधे टकराता और इस तरह गाय को भागना छोड़ने पर मजबूर होना पड़ता । कुछ ही दूर में वह बल्लू के हाथ लग जाती ।
सबसे मुश्किल होता बैल को ले जाना । उन पर कोई तरतीब काम नहीं करती । एक बार छूट निकले तो घर आकर ही दम लेंगे । दूसरी मुसीबत यह थी कि कई बैल बहुत ही अक्खड़ स्वभाव के होते । एक बार अड़ गए तो उन्हें डिगाना मुश्किल होता । कई बार तो ऐसा हुआ कि बल्लू और रस्सी समेत वे भाग खड़े होते और कुछ देर तो वह जमीन पर घिसटता लेकिन बाद में रस्सा छोड़ना पड़ता । कई बार ऐसा भी हुआ कि रस्सा से बंधे चलते बैल ने अचानक बल्लू पर पीछे से वार कर दिया और उसे सींग से घायल कर भाग खड़ा हुआ । इसलिए बिगड़ैल बैल को ले जाना बड़ी मशक्कत का काम था और उसमें बहुत खेल चलते ।
लेकिन रस्सा बल्लू के हाथ में आते ही पशु इतना तो समझा ही जाता कि अब यह आदमी उसे छोड़ने वाला नहीं है ।
ऐसा नहीं कि दोनों के बीच कोई दुश्मनी या छीना-झपटी का ही रिश्ता होता बल्कि ज्यादातर तो रास्ते में ही दोस्ती का सा संबंध बन जाता ।
बल्लू जब किसी पशु को दूसरी जगह पहुँचाने का जिम्मा लेता तो मालिक को साफ कर देता कि अपने रास्ते के लिए तो उसे सत्तू, आटा, चावल, दाल, गुड, वगैरह चाहिए ही, पशु के लिए भी गुड़, खली, शीरा वगैरह चाहिए । वह खुद भले ही दिन में शाम को रुकने पर ही खाना बनाता, लेकिन पशु को थोड़ी-थोड़ी देर में उसकी मनपसंद चीजें खिलाता जाता । इस तरह पशु उस पर भरोसा करने लगता और अनजान रास्तों और जगहों में उसे ही अपना एकमात्र परिचित और हितू समझने लगता ।
बल्लू ने अपने अनुभव से कुछ ऐसे खाद्य पदार्थों का आविष्कार कर लिया था जो पशुओं को अत्यंत प्रिय थे और उनकी महक से ही अभिभूत वे खिंचे   चलते । बल्लू चलने से पहले एक थैले में अपनी भोजन-सामग्री भर लेता और दूसरे में पशुओं की । रास्ते में रात हो जाती तो वह किसी कुएं के किनारे या पोखर या नदी के किनारे खुले में रात बिताता । वहीं खाना बना सो रहता और सुबह फिर आगे कूच करता । सर्दी के दिनों में उसे खेतों में रखवालों की झोंपड़ी वगैरह की शरण लेनी पड़ती ।
जिंदगी में उसे लोगों से बात करने का मौका कम ही मिलता । बस दो-चार मतलब की बातें होतीं ।
लोगों से भला वह क्या बात करे ? वे बात करने लायक होते ही नहीं । उनकी तो बात-बात में स्वार्थ, ईर्ष्या, क्रोध, घृणा की बदबू आती है । उनसे जितनी जल्दी और जितने कम शब्दों में छुटकारा मिले उतना ही अच्छा ।
जब वे असली मकसद के लिए लंबी भूमिका बांधते तो वह असली बात को देख लेता और इंतजार करता कि कब वह इस फिजूल को छोड़ असल पर आएगा । उस पर कोई जब उसकी तारीफ करता या नरमी से बोलता तो वह सावधान हो जाता कि अब कोई नई मुसीबत सामने आने वाली है । मतलब अब वह ऐसी माँग करेगा जो पूरी नहीं कर सकेगा और फिर उतनी ही गालियाँ सुननी होंगी । कोई उस पर मेहरबान हो जब बढ़िया खाना खिलाने की पेशकश करता तो वह समझ जाता कि अब उसका कचूमर निकलने वाला है । इसलिए मनुष्य से बात करने में उसका कोई उत्साह बनता ही नहीं ।
लेकिन पशु वैसे नहीं थे ।
बल्लू जानता था कि वे बेहद सीधे-साधे, सच्चे और प्रेम करने वाले हैं । मालिक उनसे चाहे जैसा बर्ताव करे, पूरा खाने को भी न दे और दिन रात काम में जोते रखे, तब भी वे मालिक को देख खुशी से खिल    उठते । वे पूरी तरह समर्पित होते और अपनी भूख-प्यास, सुख-दुख की बिल्कुल परवाह नहीं करते ।
बल्लू इस बात को अच्छी तरह जानता था । और एक तरफ मालिक थे जो उनसे अमानवीय व्यवहार करते । काम ज्यादा लेते और अधभूखा रखते । खाने को भी रूखा-सूखा कुछ बेमन से डाल देते । जब वे काम लायक नहीं रहते तो उन्हें लावारिस मरने को छोड़ देते । जरूरत होती तो किसी को बेचने में भी उन्हें अफसोस नहीं होता ।
बल्लू इन सब बातों को अच्छी तरह जानता था ।
वह यह भी जानता था कि इन पशुओं को अपने सगों से और मालिक और उसके परिवार से बिछुड़ने से असह्य दुख होता है । वे पूरे रास्ते भर रोते जाते । बल्लू उनके दुख और आंसुओं को अच्छी तरह समझता था । वह रास्ते में उनसे बात करता चलता । उन्हें सहलाता, पुचकारता जैसे उनके दुख को कम करने की कोशिश कर रहा हो । वे भी उसकी संवेदना को समझते और रास्ते में ही इतने करीब आ जाते कि जीभ से उसके हाथ-पैर को चाटकर अपना आभार व्यक्त करते ।
बल्लू सारा रास्ता उनसे बात करता चलता - "अरे, धौली ! बहुत इतराती थी न अपनी हवेली पर । तू तो किसी को कुछ समझती ही नहीं थी । बड़ा प्रेम करती थी मालिक से । दो जोड़ी हट्टे-कट्टे बैल दिए और पाँच-छः बरस तक सारे परिवार को दूध-दही-घी-छाछ से सराबोर रखा । देखा कैसा इनाम दिया । रोती क्यों है, अब उनकी बेटी की सेवा कर । जब बेकार हो जाएगी तो कसाई को बेच देंगे ।"
 धौली गाय उसकी बातें समझती थी । लेकिन यह जीवन कोई वरदान तो है नहीं, अभिशाप ही तो है । इसे तो झेलना ही है । झेलकर ही तो इससे मुक्ति मिलेगी । फिर और जीवन, फिर और झेलना । इस तरह अनगिनत जीवन । पशु से ज्यादा इस अभिशाप को कौन समझता होगा ।
समझने वालों में एक और था - बल्लू ।


 [ सभी फोटो नैट से साभार ]

Sunday, 15 June 2014

चे के जन्मदिन के अवसर पर

चे  के  जन्मदिन के  अवसर  पर


  समकालीन कवि नेरुदा के संस्मरण से


भारत में चे 
चे ग्वेवारा से मेरी मुलाकात एकदम अलग तरह की थी वह हवाना में हुई रात के एक बजे का समय रहा होगा जब मैं उनसे मिलने आफिस अर्थव्यवस्था या मुद्रा विभाग में गया जगह और दिन अब मुझे ठीक से याद नहीं है उन्होंने मिलने का समय आधी रात का रखा था लेकिन मुझे आने में कुछ देर हुई मुझे एक सरकारी समारोह में जाना पड़ा और वहां मैं अध्यक्ष-मं में बैठा था
चे उस समय फौजी वेश और बूट पहने थे, कमर में पिस्तौल थी दफ्तर के बैंक वाले माहौल में उनकी वेशभूषा कुछ मिसफिट लग रही थी चे सांवले रंग के, धीरे बोलने वाले और अर्जेंटीना का लहजा लिए हुए थे वह उन लोगों में से थे जिनसे आप आराम से बैठ कर बतिया सकते हैं उनके वाक्य बहुत छोटे और हंसी के साथ गोलमोल थे जिससे लगता कि वह बातचीत को अधबीच में छोड़ देंगे
जब चे ने मेरी किताब कैंटो जनरल की तारीफ की तो मैं बहुत खुश हुआ उन्होंने बताया कि वह रात में अपने गुरिल्लाओं के बीच उसका पाठ करते हैं अब सालों बाद यह सोचकर ही मैं कांप जाता हूं कि मरते समय उनके पास मेरी कविताएं थीं रेजिस देब्रे ने मुझे बताया कि बोलिविया के पर्वतों में उनके थैले में दो ही किताबें होती थींएक गणित की किताब और एक मेरी कैंटो जनरल
उस रात चे ने मुझे जो बताया उससे मैं काफी विचलित हुआ था, लेकिन उसी में शायद उनकी नियति छिपी थी उनकी नजरें मुझसे होती हुई आफिस की अंधेरी खिड़कियों पर जा रही थी हम लोग क्यूबा पर संभावित अमेरिकी हमले के बारे में बात करते रहे हवाना की गलियों में मैंने देखा था रेत की बोरियां यहां-वहां बिखरी हुईं अचानक उसने कहा, “युद्धयुद्धहम हमेशा युद्ध के खिलाफ हैं लेकिन अगर हमने एक बार युद्ध लड़ा तो फिर हम उसके बिना नहीं रह सकते हम हमेशा उसकी ओर जाना चाहते हैं
वह मेरे लिए यह बात कह रहा था उसे सुनकर मैं स्तब्ध रह गया मेरे लिए युद्ध एक त्याज्य चीज थी वरेण्य नहीं

हम दोनों एक-दूसरे से विदा हुए और उसके बाद कभी नहीं मिले उसके बाद बोलिविया के जंगलों में उसके युद्ध थे और दुखांत मौत थी लेकिन मैं हमेशा ही चे को एक संवेदनशील व्यक्ति के रूप में देखता हूं जो अपनी ऐतिहासिक लड़ाइयों में एक हाथ में हथियार और दूसरे में कविता रखता था

नेरुदा की पुस्तक संस्मरण

बोलिविया में चे ग्वेवारा की निर्मम हत्या क्रूर आघात था उसकी मृत्यु की घोषणा करने वाले टैलीग्राम ने पूरी दुनिया को दहला दिया उसके शानदार और दुखद अंत को प्राप्त जीवन पर दुनिया भर में लाखों शोक सभाएं हुईं सारी दुनिया में जाने कितनी कविताएं उसकी मृत्यु पर लिखी गई मुझे क्यूबा से किसी साहित्यिक कर्नल का टैलीग्राम आया कविता के लिए, लेकिन मैं अभी तक नहीं लिख पाया मुझे लगता है कि इस तरह के शोकगीत में केवल फौरी प्रतिरोध की अभिव्यक्ति होनी चाहिए बल्कि जीवन के यातनापूर्ण पथ की झलक भी होनी चाहिए मैं तब तक उस कविता की तैयारी करता रहूंगा जब तक वह मेरे मन और रक्त में पक कर तैयार नहीं हो जाती

मैं इस बात को लेकर बहुत भावुक हूं कि मैं अकेला कवि हूं जिसे इस गुरिल्ला नायक ने अपनी डायरी में उद्धृत किया है मुझे याद है जब चे ने सार्जेंट रेटामार के सामने मुझे बताया कि वह सिएरा माएस्ट्रा में अक्सर अपने अगुआ, विनम्र, महान गुरिल्लाओं के सामने मेरी कविताकैंटो जनरलपढ़ता है अपनी डायरी में, जहां लगता है उसे पूर्वानुमान हो गया था, उसने मेरीकैंटो पैरा बोलिवार” ( बोलिवार का गीत) से ये पंक्तियां उद्धृत की हैं – “तुम्हारा छोटा सा शरीर जैसे एक बहादुर कप्तान…”