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Sunday, 31 August 2014

सोफिया की एक शाम -१ An Evening in Sofia -1

सोफिया की एक शाम


[ यह कथानक कुछ बड़ा है और ब्लॉग के हिसाब से उसे पूरा एक साथ देना तो अत्याचार जैसा   है । इसलिए उसे दो या तीन किश्तों में देने का मन बनाया । तारतम्य तो टूटता है, पर दो विकल्पों में से एक तो चुनना ही है, इसलिए किश्तों में ही सही ।]



वह अकेली ही आई थी । यूं उसने सुबह फोन करके बताया था कि वह कुछ दिन के लिए शहर में आई है और एक मित्र के साथ शाम को मुझसे मिलना चाहती है । क्या मेरे लिए यह संभव है ?

फोन पर तीन­-चार वाक्य बोलते हुए उसकी आवाज में थोड़ा सा कंपन जरूर था, लेकिन उतना नहीं जितना उस जैसी लड़की से कोई कल्पना की जा सकती थी । उसने वे सब वाक्य पूरे बोले थे और उनमें कोई अस्पष्टता नहीं थी ।

" जी, मैं काली बोल रही हूं । कालीना । अगर आपको याद होगा. . . दो साल पहले आपकी कक्षा में थी . . . जी आप याद कर सकते हैं क्या ?
" अरे काली तुम ? क्या बात करती हो ? तुम्हें नहीं पहचानूंगा ? "
" जी आपने पहचान लिया ? आपको मेरा नाम भी याद रहा ? . . . मुझे विश्वास ही नहीं होता कि किसी को मेरी याद भी हो सकती है . . . वह भी आपको जो. . ."
" अच्छा वह सब छोड़ो । अभी तो यह बताओ कि कहां से बोल रही हो ? शहर से या बाहर से ।"
" जी मैं कल रात को ही शहर में आई हूं लंदन से । और शहर में सबसे पहले आपको ही फोन कर रही हूं डरते­डरते कि शायद याद हो ।"
" वाव ?"
" जी मैं चाहती हूं कि अपनी मित्र मरीना के साथ शाम को आपके घर मिलने आऊं । क्या संभव है ? जानते हैं न मरीना को ?"
" जरूर आ जाओ । मरीना को भी अच्छी तरह जानता हूं । बल्कि आजकल वापस जाने की तैयारी में हूं और बहुत अकेला सा महसूस कर रहा हूं ।"
" तो शाम को मिलेंगे । तब तक के लिए ।"

काली यानी कालीना बेहद छुईमुई सी, शर्मीली लड़की हुआ करती थी । बहुत ही पतली­-दुबली और लंबी । रंग इतना श्वेत कि बाकी गोरे लोगों के बीच में कोरे कागज सी अलग से दिखाई पड़े । बड़ी­-बड़ी हिरनी सी डरी­-डरी आंखें । क्लास में सबसे पीछे कोने में इस तरह छुप कर बैठने वाली मानो सबकी नजरों से छुप जाना चाहती हो । कभी कोई सवाल पूछ लिया तो पसीने से तर जैसे अब मूर्छित हो गिर पड़ेगी । कभी न किसी चीज के बारे में पूछेगी, न सामने पड़ेगी । रास्ते में अपनी सहेली की ओट में छिपकर चलने वाली ।

मैंने उसे कभी एक भी शब्द बोलते नहीं सुना ।

यहां तक कि परीक्षा में भी नहीं । नियम था कि परीक्षा में 8­-10 छात्रों को 3-­4 अध्यापकों के पैनल के सामने एक कमरे में बिठा दिया जाता । सब अध्यापक वहीं हर छात्र को 3-­4 प्रश्न लिखने के लिए बोलते और एक घंटे का समय देते । एक घंटे बाद उन्हीं के सामने उनके उत्तरों की जांच होती और गलतियों के बारे में पूछा जाता और उसके हिसाब से अंक दिए जाते । छात्रों को अधिकार रहता कि वे गलतियों के बारे में अपनी सफाई दे सकें या कम अंक दिए जाने पर जिरह कर सकें । कालीना न तो किसी गलती की सफाई देती, न अंकों पर आपत्ति करती ।

लेकिन उसका पूरा व्यवहार इतना विचित्र था कि दो बार मैं उसे फेल करने की हिम्मत नहीं कर पाया । लगता एक निरीह प्राणी के प्रति अन्याय जैसा होगा । वह शायद इस बात को जानती थी क्योंकि उसकी आंखों में एकाध बार यह अनुग्रहीत सा भाव दिखा । लेकिन जबान से कभी उसने कुछ नहीं कहा ।

उसका सब कुछ इतना असहाय सा होता कि मन में उसके प्रति एक करुणा सी बनी रहती । वह शरीर और मन से ऐसे पवित्र और पारदर्शी लगती कि उसे देखते ही हमेशा होठों और मन में एक स्मिति सी खिल जाती ।

इसी में वह कोर्स पूरा करके चली गई और बात समाप्त हो गई । हां, बीच में एक और बात हुई थी शायद ।

एक बार छुट्टियों में मैंने परिवार के साथ सोफिया से वारना जाने का कार्यक्रम बनाया । ये दोनों ही बल्गारिया के बड़े शहर हैं और दोनों के बीच का फासला देश में सबसे बड़ा फासला है यानी पांच घंटे का । एक धुर दक्षिण­-पश्चिम में है तो दूसरा धुर उत्तर­पूर्व में । इन दोनों के बीच देश की प्राचीन राजधानी वैलीक तरनोवो ( यानी बड़ा तरनोवो ) पड़ती है । यहां हम कुछ दिन रुककर वारना जाना चाहते थे ।

यही बात क्लास में हो रही थी और मैं छात्रों से यात्रा के लिए सुझाव मांग रहा था । सबने अपने­-अपने सुझाव दिए और कई ने कहा कि उसका गांव या कस्बा या शहर बीच में पड़ेगा और अगर हम वहां से गुजरें तो उन्हें फोन अवश्य कर दें ।

लेकिन कालीना ने इसमें कोई हिस्सा नहीं लिया ।

अगले दिन उस सत्र की आखिरी क्लास लेकर जब मैं घर जाने के लिए अपनी गाड़ी में बैठ चुका तो वह तेजी से आई और एक कागज मेरी गोद में फेंक तेजी से चली गई । मैं कुछ पूछ भी नहीं सका ।

पढ़कर देखा तो उसमें वैलीक तरनोवो के बारे में तमाम जानकारी थी कि हमें कहां­कहां, क्या­-क्या देखना चाहिए । बाद में वहां के सबसे बड़े होटल का पता था और उसमें काम करने वाली एक लड़की का नाम इस सूचना के साथ कि उसने हमारे लिए वहां रहने का आरक्षण करा दिया है, कि हम जितने दिन चाहें वहां रह सकते हैं । उसी में यह भी बताया था कि यह उसका अपना शहर है और कि वह इस होटल में छुट्टियों में अक्सर काम करती है इसलिए उसके कई मित्र वहां हैं, कि इस बार वह शहर में नहीं जा रही क्योंकि उसने पहले ही बाहर जाने का कार्यक्रम बना लिया है । और अंत में खेद जताया था कि वह कितनी अभागी है कि हमें अपने शहर घुमाने का इतना अच्छा मौका गंवा रही है ।'

वैलिको तरनोवो शहर में घूमते-घामते जब पहुंचे तो शाम हो गई और आराम करने की इच्छा थी इसलिए सबसे पहले कालीना के बताए होटल में ही गए । परिचय देते ही सबका व्यवहार बड़ा आत्मीय हो गया और हमारी बहुत आवभगत हुई । यह सब उस चुपचाप सी लड़की कालीना का प्रताप था ।

इसके बाद उससे कभी भेंट नहीं हुई कि हम सब कुछ के लिए उसका आभार प्रकट कर सकते ।

और दो साल के बाद अचानक यह फोन ?


v   

जी हां मेरा नाम ही काली है । यह नाम मुझे करन जी ने ही दिया । हालांकि मैंने कभी इस या किसी भी नाम से पुकारे जाने का कभी जवाब नहीं दिया या यह कहना सही होगा कि जवाब देते मुझसे बना नहीं, लेकिन अपना यह नया नाम मुझे रोज ही क्लास में कम­-­-कम एक बार तो सुनाई पड़ता ही । मेरी भाषा में इस नाम का कोई अर्थ तो नहीं बनता लेकिन मुझे पुकारने की सुकरता के लिए यह बहुत अच्छा लगा । वैसे भी इस तरह के नाम के छोटे रूपों के कोई अर्थ होते ही कहां हैं ।

सब लोगों ने पहले तो मजाक में लेकिन बाद में आदतन मुझे इसी नाम से बुलाना शुरू भी कर दिया । स्वाभाविक इच्छा हुई कि जानूं कि आखिर हिंदी में इसका कोई अर्थ है या नहीं ।

अर्थ था और ऐसा कि दोनों ही मुझे अभिभूत करने वाले । एक था रंग और दूसरा था देवी का । मेरा खुद का रंग हालांकि कुछ ज्यादा ही गोरा था लेकिन फिर भी मुझे काला रंग बहुत प्रिय था । काले सांवले लोग तो मुझे सुंदर लगते ही थे, काले रंग की पोशाकें भी सुंदर लगती थीं । मेरे अधिकांश कपड़े काले रंग के ही थे । बचपन से ही कितने ही कारणों से मुझमें एक गहरी हीन भावना जड़ जमा कर बैठ गई थी जिसे लोग संकोच, लज्जा और न जाने क्या­क्या कहते । यह हीन भावना इतनी गहरी थी कि मैं अपनी हर चीज को हीन मानती । शरीर को भी, बुद्धि को भी, अपनी चाल को भी, पसंद को भी, सोचने को भी । मेरा सब कुछ कितना गलत और असंगत था जिसे मैं सबसे छुपाने का हमेशा प्रयास करती । इस कारण मैं फैशन की बात तो सपने में भी नहीं सोच सकती थी लेकिन फिर भी लोग कहते कि काले वेश में मेरा रंग और उभर आता था जैसे अंधेरी शरत की रात में चांद हो ।

दूसरा अर्थ देवी का था ।

मुझे लगता कि ऐसा कह वे मेरा मजाक बनाते हैं । मैं यही सोचती कि ये जो इतने दो सुंदर अर्थ काली के हैं, वे मेरे लिए तो नहीं ही हो सकते । हो सकता है करन जी ने किसी और अर्थ को ध्यान में रखकर यह नाम दिया हो या व्यंग्य में दिया हो । मैं तो इसके योग्य कहां हूं ।

जो भी हो, वे मुझे तमाम शंकाओं और भय के बावजूद कुछ अलग से, आत्मीय से, सदय से, तरल से लगते । पारदर्शी भी । इसलिए यह नाम देते वक्त उनमें कुछ बुरा भाव होगा इसकी मैं कल्पना नहीं कर सकती थी ।

इसलिए भी कि इन पिछले दो सालों में बहुत कुछ ऐसा था जो उन्होंने मेरे लिए न दिखाते हुए ही किया । याद करती हूं तो बहुत सी चीजें याद आ रही हैं । एक बार जब घर का काम देने पर उन्होंने हमारी चोरी पकड़ ली थी कि हम चार लड़कियों ने एक ही जैसा लिखा है । यानी किसी एक ने लिखा है और बाकी तीन ने नकल की है । उन्होंने  हंसते हुए पूरी क्लास के सामने इस रहस्य का उद्घाटन किया था और हमसे पूछा था कि असल किसने लिखा है । हम चुप ।

वे शायद न जानते हों, या शायद जानते भी हों, कि ऐसा करना हमारे विश्वविद्यालयों में घनघोर अपराध है जिसके लिए कक्षा से, विश्वविद्यालय से निष्कासन की सजा होती है । भले ही होमवर्क हो । और जब उन्होंने हम लोगों के चुप्पी साध जाने पर इस बात को हंसी में टाल दिया तो एक नई मुसीबत खड़ी हो गई । किसी लड़के ने इसकी शिकायत विभागाध्यक्ष पैचीनोवा से कर दी । वे बहुत ही चुप रहने वालीं, अनुशासन प्रिय महिला थीं

फिर क्या था । वे आ गईं धड़धड़ाती हमारी क्लास में और हम चारों को कहा कि हमें इसकी सजा मिलेगी । ऐसा अपराध और वह भी एक अतिथि प्रोफैसर की क्लास में ? हमें लगा कि हमें निकाल ही दिया जायगा ।

हम तो किसी भी दिन अपनी छुट्टी के नोटिस का इंतजार कर रही थीं । लेकिन जब काफी दिन गुजरने पर भी नहीं आया तो मन में जिज्ञासा हुई कि बात क्या हुई । पैचीनोवा जी ने बस इतना ही कहा कि किसी सम्माननीय अध्यापक की वजह से हम लोग बच गई हैं । मेरी दूसरी सहेलियों ने करन जी से पूछा भी तो कोई उत्तर नहीं मिला । इधर­-उधर से पूछताछ करने पर मालुम हुआ कि हमारा पक्ष लेकर किस तरह उन्होंने शिकायत विश्वविद्यालय में न भेजने के लिए पैचीनोवा को मनाया था ।

इसी के साथ मेरे दो साल पास होने का चमत्कार भी शायद उनकी उदारता से ही जुड़ा था । या मैं अपने हीनता बोध के कारण अपनी सफलता को अपना किया मान ही नहीं सकती थी ।

यह और ऐसा बहुत कुछ था जो मुझमें उनके प्रति एक आत्मीयता पैदा करता था । लेकिन यह सब न भी होता तो भी उन्हें देखते ही मैं पहले दिन ही समझ गई थी कि यह प्रोफैसर तो अजीब है । नहीं जानती थी, न आज जानती हूं कि क्यों । पर कुछ बात तो थी ही । वैसे चुप्पे लोगों में दूसरी कई इंद्रियां तेज काम करती हैं । वे कई कुछ ऐसा जान जाते हैं जो दूसरे नहीं जान सकते ।

हमारे विश्वविद्यालय में ऐसा कोई प्रोफैसर नहीं था जिसके पास बी.एम.डब्ल्यू हो । और एक भारत जैसे देश से हिंदी जैसा विषय पढ़ाने वाला कोई इस कार में पहले दिन विभाग में आए तो अजूबा होगा कि नहीं । विश्वविद्यालय की बात तो जाने दीजिए, इस समय हमारे देश की जो हालत चल रही थी उसमें यह कार चर्चा का विषय बनने के लिए काफी थी । उस पर उस कार से जुड़ा वह किस्सा कि कैसे इन प्रोफैसर ने सोफिया आने के बाद सबसे पहला काम यह किया कि जर्मनी का रेल का टिकट कटाया और अगले दिन वहां से बी.एम.डब्ल्यू. चलाकर लाए और उसके बाद विभाग में आए ।

" वाव ? " 

पहले तो हम सब ने समझा कि ये नए प्रोफैसर बहुत अमीर होंगे और अपनी जमींदारी शान यहां भी लाए हैं ।

यह जिन दिनों की बात है उन दिनों हमारा देश बहुत ही नाजुक स्थिति से गुजर रहा था । हमारा ही क्यों पूरा पूर्वी यूरोप का समाजवादी ब्लॉक । समाजवादी शासन के विरुद्ध आक्रोश बढ़ रहा था और अर्थ-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी । शासन से और शासकों से लोगों का विश्वास उठ चुका था जिसके कारण अव्यवस्था फैल रही थी । देश पहली बार खाने-पीने की चीजों की कमी, बेरोजगारी से जूझ रहा था । सामाजिक, राजनीतिक, व्यक्तिगत सुरक्षा का घेरा टूट रहा था और असुरक्षा की भावना बढ़ रही थी । हर व्यक्ति इस फिराक में था कि मौका मिले तो देश से बाहर निकल ले ।

ऐसे में किसी प्रोफैसर की और वह भी भारत जैसे देश के की इस शान को देख अटपटा भी लगा ।

 लेकिन जल्दी ही यह भी लगा कि यह कोई अमीरी की शान नहीं थी । गरिमा से जीने की आदत थी जिसका गरीबी-अमीरी से शायद उतना ताल्लुक नहीं । क्योंकि कई बार देखा जब बे­-कार होते तो उसी सहजता से बसों, ट्रामों में भी दिखे जैसे कार में । क्लास के बाद छात्रों को लेकर किसी रैस्तरां में चाय पीते हुए या सड़क पर और बाजारों में घूमते हुए । बातें जैसे गहरे दोस्तों के बीच होती हैं । विचार ऐसे विस्मयकारी कि यूरोपियों की अत्याधुनिकता भी पिछड़ी नजर आए । किसी चीज में कोई लीक नहीं, कोई लकीर नहीं । हर चीज में जैसे अपने को काटते हुए । आज अगर नव्यतम फैशन के टाई सूट में हैं तो कल जीन और जैकेट और परसों धोती­-कुर्ता में

" वाव ? "

भारतीय प्रोफैसरों के बारे में सब छात्रों में हमेशा ही श्रद्धा­-सम्मान का भाव उभरता था । वे होते भी पूजनीय जैसे ही । बहुत ही सरल से, सहज से, पूजापाठी पंडित से, विनीत से । जैसा नक्शा भारतीय परंपरा को पढ़कर गुरु का हमारे मन में बनता था । वैसे ही ।

लेकिन पहली बार यह व्यवधान सा घटा । कई लोगों को तो एकदम झटका सा लगा उस मनोमय छवि के टूटने से । हम छात्र भी काफी दिनों तक तो सकते में थे कि किस भाव से उन्हें अपनाएं ?

इसमें सबसे पहले सब छात्र उनके दोस्त बने । फिर देखा कि अपने अध्यापक भी ऐसे खुले जैसे पहले कभी आपस में भी नहीं खुले । फिर सुना विश्वविद्यालय और साहित्य तथा कला जगत में उनकी मित्रता की सूची लंबी होती गई ।

लेकिन उनका यह अलग होना मुझपर तो जैसे और ही कहर ढहा गया । मुझे तो वह कुछ­-कुछ लीजेंड की तरह नजर आते और मैं संकोच से और­-और सिकुड़ती जाती । अपनी तुलना में ऐसी भव्यता, प्रतिभा, गरिमा के सामने मेरी तो और सिट्टी­-पिट्टी गुम हो जाती

बहुत चाहती कि उन्हें अपने मन में उनके प्रति गहरी आत्मीयता, सम्मान, तरलता दिखाऊं, उनके उपकारों के प्रति आभार जताऊं, उनके करीब होने का सुख पाऊं, लेकिन सब कुछ जड़वत । इसी में दो साल बीत गए और फिर जीवन का चक्र जाने कहां से कहां ले गया ।

और हालांकि मैं दो साल बाद फिर अपने शहर लौटी और यह फोन किया लेकिन मुझे लगा कि यह मैंने इन सालों में कितनी बार चाहा । 


[All photos from net]

To be continued ....................

Sunday, 24 August 2014

शेरू एक कुत्ते का नाम है

`शेरू' की कहानी



मनुष्य होने के कारण ह स्वाभाविक ही है कि हम मानव सभ्यता, संस्कृति, समाज, परिवार और व्यक्ति-विशेष को ही अपना सरोकार बनाएँ । बाकी चीजें अगर आएँ भी तो उसी का निमित्त बनकर आएँ । साधन बनकर  आएँ । उद्दीपन बनकर आएँ । तभी उनका महत्व है और सार्थकता है ।
सृष्टि या ब्रह्मांड का यह मानव केन्द्रित या मानव सीमित दर्शन है । समस्त प्रकृति, समस्त जीव-जन्तु, चल-अचल, जड़-जंगम उसी के होने से हैं । अलग से उनका कोई अस्तित्व या महत्व नहीं है ।
सब धर्म का केन्द्र यही मनुष्य है । सबमें इसी का गुणगान है, उसी का बखान है । बाइबल में जब हफ्ते के कोई से दिन ईश्वर ने मनुष्य और अन्य प्राणियों की सृष्टि कर ली तो मनुष्य को कहा कि अब तुम इन सबको भोगो ।
और आज तक वह सबको भोग रहा है - प्रकृति को भोग रहा है, प्राकृतिक संपदा को भोग रहा है, सब प्राणियों को उनके अधिकार-क्षेत्र से वंचित कर उनकी रिक्त संपदा को भोग रहा है, स्वयं उनके श्रम को भोग रहा है । इतना भोगा कि न जाने कितनी वनस्पतियाँ हमेशा के लिए लुप्त हो गईं । कितनी प्राणिजगत की जातियाँ हमेशा के लिए खो गईं । मनुष्य केन्द्रिकता का यह खेल इस खतरनाक स्तर पर जारी है कि पहली बार स्वयं उसे लगने लगा है कि उसके अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है । कहता है सब कुछ नष्ट होने के कगार पर  है ।
अरे बाबा, सब कुछ नहीं तुम नष्ट होने के कगार पर हो । प्रकृति तो खुद संकट से निपट लेगी ।
खैर, यहाँ बात शेरू की करनी थी और शुरू हो गई यह रामकहानी । शेरू एक कुत्ता है । शेर जैसी आकृति का है इसलिए यह नाम है । वैसे भी कुत्तों के लिए शेरू नाम एक ब्रेंड की तरह है । बचपन से ही परिवार में आ गया और नाम शेरू पड़ गया । उसके पिता के बारे में तो पता नहीं लेकिन माँ को हम सब ने देखा है । वह झबरे सफेद रंग की खूब प्यारी सी थी और नाम भी लोगों ने रख रखा था राम प्यारी । सारे मुहल्ले की प्यारी थी ।
शेरू ने काला रंग पाया तो माना जा सकता है कि वह पिता पर गया होगा और काले रंग का ही कोई कुत्ता उसका बाप होगा । हालाँकि जीन थ्योरी में यह जरूरी नहीं है । कई पीढ़ियों के बाद भी जीन का असर आ सकता है । तो रामप्यारी ने चार पिल्ले दिए थे जिनमें से केवल एक शेरू ही जीवित बचा था । कुत्तों में शिशु मृत्यु दर उस समय मनुष्यों की तुलना में अधिक ही रही होगी । क्योंकि ज्यादातर मनुष्य परिवार में जीवन-मृत्यु दर बराबर-बराबर थी जबकि कुत्तों में लगभग 3:1 के अनुपात में ।
रामप्यारी का एक ही पिल्ला रह गया जो बाकी सबके हिस्से का दूध पीकर खूब मुटा गया था । माँ-बेटे दोनों सारा दिन मुहल्ले में घूमते रहते कि एक दिन अचानक रामप्यारी एक घर की छत से गिरकर मर गई और शेरू संसार में बिन माँ-बाप का अकेला रह गया । मनुष्य का इतनी छोटी उम्र का बच्चा अगर बिना माँ-बाप का हो जाय तो वह क्या करेगा ! लेकिन रामप्यारी कुतिया का यह नन्हा बच्चा तो जैसे सब माँ के पेट से ही सीख कर आया था । माँ के मरने पर दुख तो हुआ होगा, उसकी याद भी बनी रही होगी, इतनी बड़ी दुनिया में अकेले होने का अहसास भी हुआ होगा । लेकिन सब भावों से बढ़कर है जीवन को आगे चलाने का भाव, जिजीविषा ।
तो यह छोटा सा पिल्ला माँ को खोकर कोई शरण ढूँढने की कोशिश में हर आने-जाने वाले के पीछे लग लेता, कभी पैर चाटता, कभी भोली आंखों से मनुहार सी करता ताकता, कभी उल्टा होने की कलाबाजी दिखा मन मोहना चाहता । और इस प्रक्रिया में ही वह हमारे आँगन में आकर बैठ गया । चूल्हे में रोटियाँ पक रही थीं और सब लोग गोबर लिपे रसोई के फर्श पर पालथी मारकर थाली परोसे जाने की प्रतिक्षा में बैठे थे । कि वह चुपके से मुझसे सटकर बैठ  गया । बिन माँ-बाप के उस प्यारे से बच्चे को देख सबको बड़ी दया आई । हरेक ने अपनी थाली से एक कौर उसे भी दिया । खा-पीकर जब बैठक की ओर आने लगे तो वह भी साथ चला । उसके बाद रात गए वहाँ से उठकर जब बाबा पशुओं के स्थान घेर की ओर जाने लगे तो वह उनके साथ वहाँ चला गया । रात में उनकी चारपाई के नीचे सोया ।
उसके बाद से तो वही उसका स्थाई ठिकाना हो गया । धीरे-धीरे उसने अपने को परिवार के एक सदस्य के रूप में मनवा लिया । भोजन के समय सब लोगों के साथ वह घर आ जाता । खाने के बाद उन्हीं के साथ पशुओं के घर में चला जाता । वहाँ रहने वाले बैलों, गाय और भैंसों से उसकी अच्छी-खासी जान-पहचान हो गई थी । विशेषकर बैलों से । क्योंकि बैल ही थे जो ज्यादातर दिन गाँव से बाहर जाते । चाहे हल चलाने के लिए, या तो हरट चलाने के लिए या कोल्हू या बैलगाड़ी वगैरह के लिए । इसलिए वह ज्यादातर समय उन्हीं के साथ बिताता ।
खेती-बाड़ी से संबंधित जितने भी काम थे उनमें किसान और बैलों की भूमिका सबसे अहम रहती । शेरू उन्हीं के साथ रहता । गाय और भैंसों में उसकी दिलचस्पी बिल्कुल नहीं थी । क्या सारा दिन एक जगह बैठकर खाना और पगुराना । यह भी कोई जिंदगी हुई । गाय-भैंस भी शेरू को बहुत पसंद नहीं करती थीं । फिर भी दोनों ओर से शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व तो था ही ।
बाकी तो सब ठीक था लेकिन सबसे मुश्किल काम होता खेतों से घर तक के रास्ते में बैलों को अनुशासित रखना । शेरू ने अपने मालिक से जान लिया था कि बैल जब रास्ते में चलें तो जरूरी है कि इधर-उधर खड़ी फसलों में मुँह न मारें । ऐसा करने पर उसने मालिक को बैलों को डांटते देखा था । मतलब साफ था कि यह काम गलत है । शेरू को समझने में देर नहीं लगती थी । इसलिए जब काम के बाद बाबा बैलों को रास्ते पर छोड़ देते थे तो शेरू को ही उन्हें वश में रखना पड़ता ।
दोनों बैल काफी चालू थे । मालिक से फासला बनाने के लिए दोनों पहले तेज कदमों से चलते । जब देखते कि मालिक की नजर से दूर हो गए हैं तो इधर-उधर मुँह मारना शुरू करते ।
यहीं से शेरू का काम शुरू हो जाता । दोनों में से किसी ने मुँह इधर-उधर घुमाया कि शेरू जोर से डाँटता । इस तरह पूरे रास्ते शेरू और बैलों के बीच रस्साकसी का खेल चलता रहता ।
बस यह रास्ते के अनुशासन बनाने का काम जरा मुश्किल रहता । बाकी सब काम आसान थे । बैल अपना काम करते रहते और शेरू पेड़ के नीचे बैठ या तो ऊँघता या आसपास मटरगस्ती करता । भोजन के समय जब घर से खेत में खाना आता तो उसे एक कोस दूर से ही सुगंध आ जाती । उसका सारा ध्यान गाँव की ओर लगा रहता । खाना आता तो औरों के साथ शेरू को भी मिलता ।
उसके जिम्मे घर के बहुत काम थे । घर के रास्ते भर सबकी रखवाली का काम । रास्ते का काम । बाहर के काम । कभी-कभार जब घर की जनाना को बाहर जाना होता तो शेरू को उनके साथ भी जाना पड़ता । शाम को गायों और भैंसों को पोखर पर पानी पिलाने ले जाना होता । कई बार मालिक के साथ गाँव में या दूसरे गाँव तक में जाना होता । इसलिए शेरू की व्यस्तता सबसे ज्यादा  थी । अतः उसे परिवार के हर सदस्य की जन्मकुंडली के बारे में तो मालुम था ही सबके स्वभाव और जरूरतों के बारे में भी मालूम था । हालाँकि वह घर के सब लोगों को बराबर प्यार करता लेकिन कुछ को ज्यादा ही करता । घर में किसकी क्या हैसियत और औकात है, यह उसे सब पता था ।
जैसे परिवार के जीवन में कितने सुख के और कितने दुख के अवसर आते वैसे ही शेरू की जिन्दगी में भी । वह घर के सब सुख-दुख में बराबर का शरीक था । बल्कि कुछ ज्यादा ही । दो बैलों में से बधिया जब मरी तो शेरू ने तीन दिन तक खाना छुआ भी नहीं । कितना गहरा दुख हुआ ।
एक बार की बात है कि गंगा-स्नान के दिनों में पूरे परिवार ने हरिद्वार जा गंगा-स्नान करने की सोची । दो बैलगाड़ियों में सब लोग भरकर चले । दो-ढाई सौ किलोमीटर का रास्ता । शेरू भी गाड़ियों के साथ-साथ चला । उस साल गंगा पर अपार भीड़ थी । लोग ही लोग । घर लौटने से एक दिन पहले शेरू न जाने भीड़ के रेले में कहाँ गुम हो गया । पूरा शहर छान मारा लेकिन शेरू का कोई पता नहीं लगा । सबको बड़ा अफसोस हुआ । लौटते समय पूरे रास्ते उसी की चर्चा होती रही । कहाँ चला गया ? कोई उठा तो नहीं ले गया ? कहीं भीड़ में दब तो नहीं गया ?
कहाँ गया ?
जिंदा होगा तो कैसे मिलेगा । सौ-डेढ़ सौ मील का रास्ता । दस दिन का सफर । इसी अफसोस से भरे लोग गाँव पहुँचे । पहुँचकर कई दिन तक उसी की चर्चा होती रही । किसी को चैन नहीं । कि 10-15 दिन बाद एक रात अचानक सबने घेर के बाहर शेरू की आवाज सुनी । वह जोर-जोर से पुकार रहा था । शरीर पर कुछ घाव भी थे । न जाने कितनी मुसीबतें झेलकर वह यहाँ पहुँचा   था ।
लेकिन पहुँच गया ।
उसके बाद तो शेरू के प्रति सबका प्रेम भाव कुछ और ही गहरा गया ।
इसी में उसकी उम्र पूरी हो गई ।
किसे मालूम था कि कुत्ते की ज्यादा-से-ज्यादा आयु 12-14 बरस से अधिक नहीं हो सकती । शेरू अपनी अधिकतम आयु के निकट था । सब लोग जान रहे थे कि वह बूढ़ा हो चला है और अंतिम समय नजदीक है । वह थोड़ा उदास भी रहने लगा । अंतर्मुखी सा । कि एक दिन सुबह पाया कि शेरू नहीं है । बहुत ढूँढा पर नहीं मिला । बाबा ने बताया कि कुत्ते मरने के लिए किसी नितांत एकांत जगह में जाकर बैठ जाते हैं कि उन्हें मरते या मरने के बाद कोई न देखे ।
शेरू के जाने पर जैसे सारे मुहल्ले में ही मातम छा गया ।




Monday, 4 August 2014

रमेश रंजक - सिद्धहस्त विधा में सारत्व की खोज

रमेश रंजक स्मृति

सिद्धहस्त विधा में सारत्व की खोज



कुछ लोग होते हैं जिनमें बहुत ड्राइव होता है । मतलब कुछ कर गुजरने की तमन्ना । उनमें बहुत ऊर्जा होती है, बहुत कंसंट्रेशन होता है । रमेश रंजक ऐसे ही थे । उके पास ब्रज के लोकगीत की जमीन थी । उसकी धुनों में सिद्धहस्तता थी । फिर उसने एक समय यह सीख लिया कि इन लोकगीतों की धुनों में अगर आज के आदमी और उसकी जिंदगी की मुसीबतों को डाल दिया जाय तो उनसे चमत्कार हो सकता है । ये धुनें लोगों की जुबान पर हैं इसलिए छंद को पकड़ने में मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी । उसमें जो वस्तु होगी वह भी उनकी जिंदगी की ही होगी, इसलिए उसे भी समझने में मुश्किल नहीं होगी ।
बस फिर क्या था । ऐसी दर्जनों धुनों का इस्तेमाल कर उसने उनमें नया कंटैंट भर दिया । अब कृष्ण के मुख से गवाया गया " मैय्या कर दै मेरो ब्याह, मगाइ दै दुलहिन गोरी सी " का रसिया ब्रज से बाहर भी खूब प्रचलित है । उसी में रमेश ने " कचहरी के मारे का गीत " लिख दिया -
"  ऐसे धरे धूप ने धौल देह सब कारी है गई है
कारी है गई है........ देह सब कारी है गई है । …ऐसे धरे धूप ने …….
जब चाहे तब पायं भगाए कोट कचहरी ने
जब पहुंचे तारीख डार दर्ह गूंगी बहरी ने
इतनी करी परेड देह सरकारी है गई है
ऐसे धरे धूप ने धौल......."
रमेश इसे जब तरन्नुम में गाते तो समा बंध जाता ।
उस पर उसने स्वर भी अच्छा पाया था । ऊपर तक आवाज साध लेता था । इस तरह भीड़ जुटने लगी । उसे एक बार यह जड़ी मिल गई तो फिर तो उसने गीतों की झड़ी लगा दी । साल में दो संग्रह लायक गीत हो जाते ।
संग्रह छपवाने की पूरी प्रक्रिया एक फिल्मी सीन की तरह थी । वैसे तो यहां-वहां रमेश से भेंट होती ही रहती थी । लेकिन अचानक जब दोनों भाई - रमेश और महेश उपाध्याय - दुपहिया स्कूटर पर घर आ धमकते तो मैं समझ जाता कि संग्रह लायक गीत हो गए हैं । साथ में पांडुलिपि होती जिसे वह मेरी ओर फेंककर कहता -
" दो सौ हैं, बेरहमी से काटोगे तब भी 70-80 बच जाएंगे । संग्रह के लिए काफी हैं ।"
इस तरह 10-15 दिन में मैं गीत छांटता । चुने हुए गीत लेने दोनों भाई फिर आते ।  इस तरह यह संपादन क्रिया पूरी होती ।
महेश उपाध्याय भी गीतकार हो गए थे । छोटे-मोटे कवि-सम्मेलन उसे भी मिल जाते । इसके बदले में उसे बड़े भाई रमेश रंजक की खूब सेवा करनी पड़ती ।
जनवादी लेखक संघ का निर्माण हुआ था और देश भर में उसके स्थापना सम्मेलन हो रहे थे । साहित्य में जनवादी दौर था और रमेश की चारों तरफ बहुत मांग थी । खासकर जनता के बीच मंचों पर । इसलिए उसे लगा कि वह नौकरी में अपना समय व्यर्थ गंवा रहा है । इसका उपयोग अगर वह केवल गीत के लिए करे तो महान गीतकार बन जाएगा । उसका कोई जोड़ नहीं है ।
उसने गीत को लोकधुनों, जनवादी वस्तु से संयुक्त कर उसमें जो नयापन भरा वह वाकई बेजोड़ था । अपने समय में वह एक पॉपुलर नाम था और उसके श्रोताओं और सराहने वालों की संख्या लाखों में थी । उसने जो गीत लिखे उनकी चमक और धमक निराली थी ।
जनता का प्यारा तो वह था ही, हम सब का कम प्रिय नहीं था । हममें से कितनों को ही उसके दर्जनों गीत कंठस्थ थे और कई बार तो उसकी अनुपस्थिति में उन्हें गा भी देते थे । रमेश रंजक वाकई एक फैनोमिना जैसा हो गया । लेकिन इसके बावजूद यह सच था कि वह बहुत कम लोगों का ही आत्मीय हो सकता था । अपने में सीमित हो जाने वाले व्यक्ति के साथ यह मुश्किल अक्सर होती है । यह रमेश के साथ भी थी । कई बार हम देखते कि रमेश उपाध्याय जैसे उसके मित्र कई मामलों में तीखे रूप में उसके प्रति राय देते ।
महान गीतकार बनने की झोंक में रमेश ने दिल्ली के स्कूल की जमी-जमाई नौकरी छोड़कर रिटायरमेंट ले लिया था । इसलिए रहने के लिए छोटे भाई महेश के पास आ गया । उसे सरकारी क्वाटर मिला हुआ था । उसकी घर-गृहस्थी थी इसलिए खाने का भी इंतजाम हो जाता । फिर उसने कहना शुरू किया कि घर में काम करने में बहुत बाधा पड़ती है इसलिए बगल में एक कमरा किराए पर ले लिया । खाना महेश के घर से आ ही जाता था - अपने लिए और मित्रों के लिए भी । कहीं बाहर जाना होता तो महेश स्कूटर समेत हाजिर होता । सुना कि रमेश की एक बीवी भी थी और उससे एक लड़की भी, लेकिन व्यक्तिगत रूप से उनसे कभी मुलाकात नहीं हुईवैसे भी रमेश अपनी निजी जिंदगी के बारे में कोई भी बात करना पसंद नहीं करता । बीवी शायद अलग कहीं रहती थीं और लड़की को राजस्थान में किसी विद्यालय के हॉस्टल में रख दिया था ।
जनवादी लेखक संघ बना तो राज्यों में और फिर जिलों में संगठन की इकाइयां बनने लगीं, सम्मेलन होने लगे । सम्मेलन होते तो केन्द्रीय कार्यालय में संगठन के केन्द्रीय पदाधिकारियों की मांग के पत्र आते । दो दिन की विचार-गोष्ठियां रखी जातीं । इसलिए मुझे केन्द्र से तीन-चार साहित्यिक नेताओं का इंतजाम करना पड़ता । खुद जाना तो अनिवार्य था ही केन्द्रीय सचिव होने के कारण । फिर हर जगह एक या दो रातों को जनता को जुटाने के लिए कवि-सम्मेलन रखा जाता । उसके लिए 5-6 कवियों की मांग आती ।
दिन की गोष्ठियों में जहां लेखकों और साहित्य के गंभीर पाठकों की संख्या होती तो रात में होने वाले ये कवि-सम्मेलन आम जनता के लिए होते । इसलिए इसमें साहित्य की मुख्य-धारा में प्रतिष्ठित कवियों की जगह छंद, लय, तान, गान में समा बांधने वाले गीतकारों का महत्व होता । धूमिल जैसे लोकलुभावन कवि को आम जनता के बीच उखड़ते हमने कई बार देखा था । इसलिए इन सम्मेलनों के लिए गीतकारों की अधिक मांग आती । इसमें भी रमेश रंजक का नाम सर्वोपरि अनिवार्य होता । तो मुझे साथ में रमेश को भी ले जाना होता । इस तरह कितनी ही रेलगाड़ी की यात्राएं हमने साथ-साथ कीं । उनके बहुत से अनुभव हैं जिन्हें लिखना बहुत विस्तारित हो जाएगा । इसलिए केवल कुछेक ।
हम लोगों को मध्य प्रदेश के कटनी कस्बे में जाना था । भयंकर गर्मी थी और रेलगाड़ी का साधारण स्लीपर का ही टिकट होता था । पसीने के मारे बुरा हाल था । रमेश सीट पर भी बैठता तो कंधे पर खादी का थैला टांगकर बैठता । हर आध घंटे में बाथरूम जाता और फिर वापस आकर बैठ जाता । मुझे लगा कि ज्यादा पेशाब आने की बीमारी से पीड़ित है । ऐसे ही 4-5 घंटे जब गुजर गए तो मैं भी बाथरूम जाने को खड़ा हुआ । कंधे का थैला मुझे देते हुए बोला कि यह लेते जाओ । सोचा कि साबुन वगैरह होगा । अंदर जाकर देखा तो थैले में एक शराब का अद्धा पड़ा था । यह तो बाद में पता चला कि ऐसे कई अद्धे वह सफर के लिए अटैची में लेकर चलता । थैले में एक जब खत्म हो जाता तो दूसरा रख लेता । इस तरह यह सिलसिला चलता रहता । गंतव्य पर पहुंचकर तो रात में खान-पान जमता ही ।
रमेश का जन्म हालांकि बहुत ही साधारण परिवार में हुआ और जीवन भी आम लोगों के बीच बीता । इसलिए यह सहज ही माना जा सकता है कि उसे जीवन यथार्थ का व्यापक और गहरा अनुभव था । लेकिन धीरे-धीरे वह अपने कविपन और गीत विधा में कुछ ऐसा बंद और सीमित होता गया कि बाहर का सब कुछ उसके लिए बेमतलब होने लगा । वह था, उसके गीत थे, गला था और वाह-वाह करते दर्शक थे । इसके अलावा दुनिया थी ही नहीं । इस दुनिया का अगर कोई मतलब था तो यही कि वह एक गीतकार को सुविधाएं मुहैय्या कराए, उसका सम्मान करे ।
 उसे अपने महान गीतकार होने का इतना गुरूर हो गया था कि वह आम लोगों को लगभग हिकारत की नजर से देखता जैसे उनकी वहां उपस्थिति बेमतलब हो । इससे कई बार बड़ी विचित्र स्थितियां पैदा हो जातीं ।
एक बार के सफर में हम लोग जब ट्रेन में चढ़े तो खिड़की के पास एक महिला और उसके तीन छोटे बच्चे बैठे थे । रमेश को खिड़की तो चाहिए ही थी सो आव देखा न ताव खिड़की के पास बैठे बच्चे को उठा महिला की गोद में डाला और खुद वहां बैठ गया । मुझे भी बुरा लगा और बाकी लोगों को भी । महिला को तो खैर लगा ही होगा । लकिन उसके साथ कोई आदमी नहीं था इसलिए कुछ कहा नहीं । बच्चे थे और उनमें से एक दो के पेट खराब रहे होंगे । इस गर्मी में किसके नहीं हो जाते । हो सकता है कुछ बदबू भी छोड़ी हो । रमेश महिला से बोला - "  पूरी फौज बना रखी है । मटरा खिलाकर ले आई हो सबको जो बदबू फैला रहे हैं ।"
कि किसी तरह तकरार होते-होते बची ।
ऐसे ही अलीगढ़ से दिल्ली आते हुए हुआ । डब्बे में लोग ठसा-ठस भरे थे कि निकलने को जगह नहीं थी । रमेश को तो हर आध घंटे में सीट से उठ बाथरूम जाना होता । रास्ते में खड़े लोगों से धक्का-मुक्की करता कि देखो कैसे जाहिल भर गए हैं, रास्ता देने की तमीज भी नहीं । किसी ने कह दिया कि अगर इतना ही शौक है तो फर्स्ट क्लास में चला करो ।
"  हम तो हमेशा फर्स्ट क्लास में ही चलते हैं, यह तो मजबूरी में यहां चलना पड़ रहा है "  रमेश ने जवाब दिया ।
"  हां, ये तो आपकी शक्ल ही बता रही है कि कितने फर्स्ट क्लास में चलते हो । "  एक बोला और सारा डिब्बा जोर से हंस पड़ा । रमेश की शक्ल  गंवई गांव के आम आदमी जैसी ही थी । अब पब्लिक के सामूहिक मजाक से उसे निकालना कोई आसान काम नहीं था ।
ऐसे ही एक बार भिलाई के कवि-सम्मेलन में हुआ । गोष्ठी-सत्र समाप्त हो गए इसलिए बाहर के ज्यादातर लेखक चले गए थे । रात को कवि-सम्मेलन था तो गीतकार कवि ही रह गए । सब लोग एक साथ ही बराब के कमरों में टिके थे - एक कमरे में शील, एक में शलभ, एक में मैं और रमेश, एक में श्रमिक, एक में सरोज और तलवानी । पता नहीं मंच पर इसने क्या कह दिया कि लौटने पर श्रमिक आपे से बाहर । सब ने पी भी खूब रखी थी । रात में कमरे के बाहर आकर जोर से बोला कि भाई साहब दरवाजा खोलिए । उसकी आवाज का सुनना था कि रमेश के होश उड़ गए । लगभग गिड़गिड़ाते बोला कि किसी भी कीमत पर नहीं खोलना, वह कातिल है ।
मुझे सब मजाक ही लग रहा था । मैं दरवाजा खोलने उठा तो रमेश गिड़गिड़ाने लगा । मुझे यह हास्यास्पद लगा और मैंने उसे डांटकर दरवाजा खोल दिया । अंदर आकर श्रमिक ने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया और कहने लगा कि हमने इस गवनियां को इतना सिर चढ़ा रखा है कि वह हर किसी का अपमान करता फिरता है । फिर उसने बताया कि साला कवि क्या है, नचनिया-गवनियां है । इससे बेहतर तो हमारे यहां की पतुरिया गा-नाच लेती हैं । उसका चेहरा तमतमाया हुआ था । शायद बहुत अपमानित हुआ था । फिर उसने बताया कि उसने दस खून किए हैं अपने हाथ से और आज ग्यारवां करेगा । फिर मुझसे अनुरोध किया कि मैं जरा बाहर चला जाऊँ कि वह इससे अच्छी तरह निपट ले ।
रमेश बहुत डर गया और कहने  लगा कि उसे अकेला छोड़कर न जाऊँ, नहीं तो उसकी हत्या हो जायगी । इधर उसकी हालत थी और उधर श्रमिक उसे और डरा रहा था । पहले तो मुझे लगा कि यह ड्रामा हो रहा है । लेकिन जब पसीने से तर कांपते रमेश की हालत देखी तो लगा कि डर के मारे कुछ अनहोनी न घट जाए । ऐसे में उसे दिलासा देना जरूरी था । तो श्रमिक को समझाया कि इस तरह मवालियों सा व्यवहार न करे और अगर कोई शिकायत है तो बैठकर उस पर बात करे । जब वह आपे से बाहर होने लगा तो मुझे भी गुस्सा आया और मैंने उसे कहा कि बस । अब वह कमरे के बाहर जाए और जो कहना है बाहर से ही कहे । वह थोड़ा शांत हुआ  लेकिन फिर भी अनुरोध करता रहा कि मैं एक फालतू के आदमी को बचा रहा हूं, जबकि आज उसका अंत होने वाला था ।
वह गालियां बकता चला गया ।
रमेश को नार्मल होने में कई घंटे लगे । तो उसकी अहमन्यता की परिणति गंभीर भी हो सकती थीं । ऐसी कई परिणतियों में वह अपने को डाल लेता था
जैसे होता है, जनवाद का ज्वार भी धीरे-धीरे उतर गया । मैं भी संगठन से अलग हो विदेश चला गया । बाद में सुना कि रमेश रंजक की आवाज का जादू भी उतर चला । वह अकेला पड़ता गया । जिस गीत के लिए उसने सब कुछ छोड़ दिया, उसी की कोई पूछ नहीं रही । लोग उसे  गवैय्या ही पुकारने लगे । फिर जाना कि इस लेबल से उबरने के लिए उसने अतुकांत कविताएं लिखनी शुरू कीं । यह उसकी विधा नहीं थी इसलिए वह उखड़ता चला गया । अकेला और अहमन्य होता चला गया । सुना कि अकेलेपन और फ्रशटेशन में उसने शराब अधिक पीना शुरू कर दिया । फिर एक दिन बल्गारिया में हिंदी अखबार से जाना कि रमेश नहीं रहा ।
यह हिंदी गीत, नवगीत, कविता के लिए एक बड़ी क्षति थी ।



रमेश रंजक के प्रमुख गीत संग्रह

किरण के पाँव

गीत विहग उतरा 

हरापन नहीं टूटेगा

मिट्टी बोलती है

इतिहास दुबारा लिखो