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Monday, 14 September 2015

15-million-year-old Magura Cave Bulgaria १५० लाख साल पुरानी मागुरा गुफा, बल्गारिया

15-million-year-old Magura Cave Bulgaria 

[ The Magura Cave (Bulgarian: Маgurata) is located in north-western Bulgaria close to the village of Rabisha, 25 kilometres from the town of Belogradchik in Vidin Province. The total length of the 15-million-year-old cave is 2.5 km .
The morphology of the cave includes one main gallery with six various-sized halls and three lateral galleries around it. The cave is very wide – concerts are held inside for Christmas and Easter – and does not cause any feeling of claustrophobia nor, on the contrary, of vertigo.
Cave paintings dating from the Epipaleolithic Age, late Neolithic, Eneolithic and early Bronze Age decorate some of the cave's walls. The cave paintings have been estimated to be 8000–6000 years before Christ. The drawings represent different important events in the society that was inhabiting the Magura cave: religious ceremonies, deities and hunting scenes, and are unique for the Balkan peninsula (wikipedia).

                                                                                                                                                                                         









 

 

 

 

 

 

१५० लाख साल पुरानी मागुरा गुफा, बल्गारिया

बल्गारिया के उत्तर-पश्चिम में रोमानिया की सीमा से लगे प्रांत विदिन में बैलोग्रादचिक नगर से १५ मील दूर स्थित ये गुफा १५० लाख साल पुरानी हैं | जब अपनी भीम बैठका गुफा-चित्रों के एक लाख पुराने होने के बारे में पढ़ते थे तो आश्चर्य होता था ।
लगभग २.५ मील में फैली इस गुफा में सैकड़ों भित्ति-चित्र बने हैं जिनमें नृत्य, गान तथा अन्य क्रियाएं चित्रित हैं । १२८ मीटर लंबी, ५८ मीटर चौड़े और २१ मीटर ऊंचे हालों वाली इस गुफा में कई बार क्रिसमस और ईस्टर के उत्सवों पर संगीत कार्यक्रम हो चुके हैं । यहां होना अपने में अद्भुत अनुभव था । मागुरा और रास्ते में पड़ी लेदेनिका गुफाओं के कुछ चित्र ।]






With Prem Singh and Mauna Kaushik

Friday, 11 September 2015

जॉर्ज लूकाच १९२२ : टैगोर का गांधी उपन्यास : टैगोर के उपन्यास “घरे बाइरे” की समीक्षा George Lukács 1922 : Tagore’s Gandhi Novel : Review of Rabindranath Tagore: The Home and the World


                               

जॉर्ज लूकाच १९२२
टैगोर का गांधी उपन्यास

टैगोर के उपन्यास “घरे बाइरे” की समीक्षा


[ किसी देश या भाषा की वैचारिक क्षमता और ऊर्जा इस बात पर निर्भर है कि उसमें वैचारिक संवाद-विवाद-विरोध की जनतांत्रिक क्षमता किस हद तक है । हमारे यहां जिस तरह बात-बेबात मामूली सी असहमतियों से मारकाट की नौबत आ जाती है उससे यही सिद्ध होता है कि हम अभी जनतांत्रिक संवाद से बहुत दूर हैं – अधिकांश में तो जूतों से ही सोचते हैं और उन्हीं से संवाद करते हैं । जूते प्रतीकात्मक ही हैं क्योंकि औजारों का अत्याधुनिक इस्तेमाल भी हो ही रहा है ।

ऐसे में टैगोर जैसे भारतीय आइकन के उपन्यास “घरे-बाइरे” के बहाने उनका विश्व-प्रसिद्ध समीक्षक जॉर्ज लूकाच द्वारा किया मूल्यांकन बहुत प्रासंगिक है । सहमति-असहमति का सवाल नहीं, सवाल बहस के जनतांत्रिक अधिकार का है ।]


स्रोतः  *  जॉर्ज लूकाच के निबंध और समीक्षाएं, मर्लिन प्रैस, लंदन, १९८३
          ** बर्लिन की पत्रिका “ Die rote Fahne” में १९२२ में पहली बार छपी ।
          *** अंग्रेजी में हसन द्वारा रूपांतरण ।


जर्मनी के “बौद्धिक भद्रलोक” के बीच टैगोर  की बेहद प्रतिष्ठा एक ऐसा सांस्कृतिक कलंक है जो बार-बार और अधिक वेग से घटित हो रहा है । यह इस “बौद्धिक भद्रलोक” के पूर्ण सांस्कृतिक पराभव का प्रमाण है । यह प्रतिष्ठा इस बात का भी संकेत है कि इस वर्ग ने वास्तविक और फर्जी के बीच भेद करने वाली अपनी पुरानी क्षमता पूरी तरह खो दी है ।
जहाँ तक टैगोर का सवाल है, वह एक लेखक और विचारक के रूप में एकदम महत्वहीन व्यक्ति है । उसके पास न तो कोई रचनात्मक क्षमता है, उसके चरित्र भी एकदम इकहरे हैं, उसकी कथाएं सपाट और अनाकर्षक हैं और उसकी संवेदनात्मकता मामूली और निस्सार है । वह अपनी रचनाओं की निस्तेजता और नीरसता को उपनिषदों और भगवद्‍गीता की जूठन को उसमें ठूंसकर प्रासंगिक बने रहने की कोशिश करता है ।  समकालीन जर्मन पाठक का विवेक इतना भोथरा हो चुका है कि वह पाठ और उद्धरण तक में अंतर करने में असमर्थ है । यही कारण है कि भारतीय दर्शन की यह तुच्छ जूठन उसके रचयिता के प्रति हिकारत जगाने की जगह उसे दूरांत से आए गहन और गूढ़ ज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित करती है । जब जर्मनी की शिक्षित जनता ज्ञान के सस्ते विकल्पों को स्वीकार कर रही है, जब वह स्पेंगलर और क्लासिकल दर्शन के बीच, ईवर्स और हॉफमान या पो के बीच फर्क करने में अक्षम हो गई है तो भला वह भारत जैसे सुदूर के देश में वह फर्क कैसे कर सकती    है ? टैगोर भारतीय फ्रेनसन है जिसे वह अपनी विनीत निस्सारता में याद करता है – हालांकि उसकी रचनात्मकता फ्रेनसन से भी नीचले स्तर की है । फिर भी यह कहना होगा कि उसकी महान सफलता आज की जर्मन मानसिकता के लक्षण को समझने में सहायक अवश्य हो सकती है ।
टैगोर की इस तीखी अस्वीकृति के जवाब में उसकी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति ( जो केवल ब्रिटेन तक सीमित है) का हवाला दिया जा सकता है । अंग्रेज बूर्जुआजी के पास टैगोर को धन और प्रसिद्धि (नोबल पुरस्कार) देने के अपने कारण हैं – वह भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में अपने बौद्धिक कारिंदे को इनाम बख्श रहे हैं । ब्रिटेन के लिए प्राचीन भारत के  ज्ञान की जूठन, संपूर्ण समर्पण का सिद्धांत और हिंसा की भर्त्सना (वह भी स्वाधीनता आंदोलन के संदर्भ में ) का ठोस और स्पष्ट अर्थ है । जितना अधिक टैगोर की प्रसिद्धि होगी उतना ही कारगर तरीके से उसके देश के स्वाधीनता आंदोलन के विरोध में उसकी प्रचार पुस्तिकाओं का असरदार इस्तेमाल   होगा ।
टैगोर का यह उपन्यास कोई रचना नहीं प्रचार पुस्तिका ही है जिसमें निंदा के बहुत ही फूहड़ साधनों का उपयोग किया गया है । जितना ही टैगोर इस निंदा को  घिनौनी “बुद्धिमत्ता” से ढक प्रस्तुत करता है , एक पूर्वाग्रह-मुक्त पाठक के लिए वह और भी घॄणास्पद प्रतीत होता है । टैगोर भारतीय स्वाधीनता संग्राम के प्रति अपनी नपुंसक घृणा को “विश्वमानवतावाद” के दर्शन में छुपाकर पेश करता है ।
उपन्यास का बौद्धिक टकराव हिंसा के सवाल से जुड़ा है । लेखक राष्ट्रीय आंदोलन की शुरूआत का चित्रण करता है – ब्रिटिश उत्पादों का बहिष्कार, उन्हें भारतीय बाजार से खदेड़ने और उनकी जगह भारतीय वस्तुओं को लाने के प्रयास । और टैगोर महाशय असली मुद्दे पर आ जाते हैं – क्या इस आंदोलन में हिंसा का प्रयोग नैतिक रूप से जायज है ? वास्तविकता यह है कि भारत एक शोषित और गुलाम देश है । लेकिन टैगोर की इस सवाल में कोई दिलचस्पी नहीं है । वह आखीरकार एक दार्शनिक, एक नैतिकतावादी है जिसका सरोकार “नैतिक सत्य” हैं । यानी ब्रिटिश को अपनी तरह से होश में आने दो क्योंकि उनके द्वारा की गई हिंसा उनकी आत्मा को बेचैन कर देगी । टैगोर का काम भारतीयों को आध्यात्मिक रूप से बचाना है, उनकी आत्माओं को हिंसा के खतरों आदि से बचाना है । वह लिखता है –“ जो सत्य के लिए मरता है वही अमर होता है, और अगर सारे लोग भी सत्य के लिए मारे जाएं तो मानवता के इतिहास में अमर हो जाएंगे ।“
यह और कुछ नहीं भारत की अनंतकाल  तक गुलामी का मार्ग है । इससे भी अधिक बेशर्मी से टैगोर का यह दृष्टिकोण उन तरीकों में व्यक्त होता है जिसमें वह अपने पात्रों को गढ़ता है । जिस आंदोलन को वह दिखाता है वह बौद्धिकों के लिए एक रोमांटिक आंदोलन है । बिना इस तुलना को हद से आगे ले जाए हुए हमें भिन्न परिस्थितियों में पैदा हुए इटली के कार्बोनारी आंदोलन और रूस के नरोदनिकों की याद दिलाता है । रोमांटिक स्वप्नदर्शिता, विचारधारात्मक बड़बोलापन और जिहादी भाव इनकी खूबी थी । लेकिन यह टैगोर की असत्य प्रचार पुस्तिका का प्रारंभ-बिंदु है । वह इन साहसी रोमांटिकों, पवित्र आदर्शवाद और बलिदान की भावना से प्रेरित आंदोलनकारियों को मात्र दुस्साहसिकों और अपराधियों में बदल देता है । उसका नायक, जो एक मामूली भारतीय भद्रलोक से है इस सिद्धांत को प्रतिपादित करता है  जब वह इन “देशभक्त” अपराधी गिरोहों की अतिशय ज्यादतियों से अंदर-बाहर से नष्ट हो जाता है । वह स्वयं भी इन “देशभक्तों” की हैवानियत से शुरू हुई लड़ाई में मारा जाता है । टैगोर के अनुसार वह राष्ट्रीय आंदोलन का विरोधी नहीं था बल्कि वह तो देश के उद्योग को बढ़ावा देना चाहता था । वह देशी आविष्कारों के प्रयोग करता रहता है । वह देशभक्तों के नेता ( जो गांधी का विरूप प्रतीत होता है ) को शरण देता है । लेकिन जब ये मामले उसकी बर्दाश्त से बाहर चले जाते हैं  तो वह “देशभक्तों” की हिंसा के शिकार लोगों के पक्ष में हो जाता है और इसके लिए अपने साधनों और ब्रिटिश पुलिस की शक्ति का इस्तेमाल करता है ।
यह प्रचारात्मक, खोखली लफ्फाजी भरा पूर्वाग्रहयुक्त लेखन उपन्यास को कलात्मक दृष्टि से भी दरिद्र बनाता है । उपन्यास में नायक का विरोधी कोई वास्तविक विरोधी नहीं है बल्कि घटिया किस्म का दुस्साहसिक है । उदाहरण के लिए वह राष्ट्रीय हित के बहाने नायक की पत्नी से बड़ी धनराशि ऐंठ लेता है और उसे चोरी करने पर भी मजबूर कर देता है, लेकिन उस पैसे को राष्ट्रीय आंदोलन को न देकर अपने भोग-विलास में बर्बाद करता है । यह स्वाभाविक है कि ऐसे आदमी की असलियत को देखकर उसके अनुयायी उससे अलग हो जाते हैं ।
लेकिन टैगोर की रचनात्मक क्षमता एक ढंग की प्रचार-पुस्तिका भी तैयार नहीं कर सकी । उसके पास बातों को विश्वसनीय और प्रभावशाली बनाने की कल्पनाशक्ति तक नहीं है जैसी कि उदाहरण के लिए एक हद तक दास्तोवस्की के पास थी कि उसने अपने प्रतिक्रांतिकारी उपन्यास “पॉजैस्ड” को भी पठनीय बना दिया । टैगोर की कहानी के “आध्यात्मिक” पक्ष को यदि भारतीय ज्ञान के अधकचरे टुकड़ों से अलगा दिया जाय तो वह एक बेहद अनगढ़ पैटी बुर्जुआ गूदड़ बनेगा । अंततः मामला “घर के स्वामी” की प्रतिष्ठा की “समस्या” पर आ टिकता है – कि कैसे एक “अच्छे और ईमानदार” आदमी की पत्नी को एक रोमांटिक दुस्साहसी ने बहका लिया और कि कैसे वह असलियत समझ पश्चाताप में अपने पति से आन मिली ।
यह छोटी सी बानगी “महान आदमी” की छवि बनाने के लिए काफी है जिसे जर्मन बुद्धिजीवियों ने भगवान ही बना दिया । इस तरह की ध्वंसात्मक आलोचना के विरुद्ध उसके भक्तगण उसके “अधिक व्यापक” अन्य लेखन का उल्लेख करेंगे । हमारी दृष्टि में, किसी बौद्धिक प्रवृत्ति का महत्व इस बात से तय होता है कि वह अपने समकालीन ज्वलंत सवालों पर क्या रवैय्या अपनाती है । किसी भी सिद्धांत या दृष्टिकोण की मूल्यवत्ता या निस्सारता ( और उसे अपनाने वाले लोगों की भी) इस बात से तय होती है कि वह अपने जमाने के लोगों के दुख-तकलीफों और आशा-आकांक्षाओं के बारे में क्या कहते हैं । कोरे हवाई सिद्धांत के आधार पर “स्वयं में” ज्ञान का निर्णय नहीं हो सकता ( न हाथीदांत की मीनारों में) । जब वह मनुष्य को राह दिखाने का दावा करता है तो असलियत उजागर हो जाती है । टैगोर महोदय अपने उपन्यास में यही करते दिखाई पड़ते हैं । जैसा कि हम पहले कह आए हैं, उसकी तमाम “बुद्धिमत्ता” ब्रिटिश पुलिस की सेवार्थ लगी है । इसलिए, क्या यह जरूरी है कि हम इस “बुद्धिमत्ता” के अवशिष्ट पर अधिक ध्यान दें ?

Monday, 7 September 2015

Selma Todorova's Paintings

Some paintings of the Bulgarian painter Selma Todorova. Her introductory interview was published on the blog in last post.

Ms. Selma Todorova, who lives in Sofia, Bulgaria and is a prolific painter finding various ways and means to express, not sticking to any form or color schema.
She plans to visit India for a month to have the Indian experience and paint Himalayas and surroundings.










Self portrait : past, present and future

Thursday, 20 August 2015

Bulgarian painter Selma Todorova


Bulgarian painter Selma Todorova

Introductory interview of a renowned Bulgarian painter Ms. Selma Todorova, who lives in Sofia, Bulgaria and is a prolific painter finding various ways and means to express, not sticking to any form or color schema.
She plans to visit India for a month to have the Indian experience and paint Himalayas and surroundings.

Thursday, 12 March 2015

The first instalment of books to be published in 2015 में आने वाली किताबों की पहली खेप



The first instalment of books to be published in 2015
2015 में आने वाली किताबों की पहली खेप

पेशेवर प्रकाशकों और लेखक-प्रकाशकों से इस विनम्र निवेदन के साथ कि आज कंप्यूटर और नैट आधारित तकनीक के विकास के साथ यह जरूरी नहीं रह गया है कि किताब को परंपरागत रूप से कागज पर छापा   जाय । वह प्राकृतिक साधनों का दुरुपयोग है और पर्यावरण-विरोधी भी । पढ़े-लिखे लोग ही किताब पढ़ते हैं और थोड़ी कोशिश से वे इस नई विद्या को वैसे ही सीख और हस्तगत कर सकते हैं जैसे सबने मोबाइल को  किया।

दूसरी बात यह कि नैट पर पुस्तक को बेहद कम दाम पर या मुफ्त में उपलब्ध कराया जा सकता है और यह सपना साकार हो सकता है कि किताब कोई खरीदी-बेची जाने वाली चीज नहीं है । इरादा हो तो पुरानी जड़ जमाए आदतें भी बदली ही जा सकती हैं और कठिनाइयों का समाधान निकाला जा सकता है ।
 
मैं अपनी सभी छपी किताबों को प्रकाशकों से मुक्त करा नैट पर डालने के प्रयास में हूं । फिलहाल एक छपी और चार नई किताबें हैं जिन्हें शीघ्र ही नैट पर उपलब्ध कराने का इरादा है । बाकी साल के अंत तक । जरूरी लगा तो मेले-ठेले के लिए ५-१० कापी प्रदर्शन के लिए निकाली जा सकती हैं ।

Covers Designs of the Books
 पुस्तकों के कवर


 Diary of a critic - Part 1


 Diary of a critic - Part 2


 "Himalaya Nahin Hai Vitosha (Poetry Collection)
3rd edition


 Mazeed Miyan Aur Marsalla Ka Saal
(Short story collection)


 Sriheen Hoti Hamari Duniya


( Reminisces )


Thursday, 22 January 2015

कुमार अंबुज की कविताओं की एक शाम




[ गोष्ठी रपट, कुमार अंबुज की कविताएं, चित्र “समकालीन तीसरी दुनिया” में प्रकाशित हैं । यहां उद्देश्य इन्हें शेयर करना है ।]

 

नई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में 29 नवंबर को ‘नव सर्वहारा सांस्कृतिक मंच’ द्वारा अंधेरे के विरुद्ध कविता पाठ का आयोजन हुआ। इस अवसर पर एकल कविता पाठ कुमार अंबुज ने किया जिसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध प्रगतिशील आलोचक प्रो- कर्ण सिंह चौहान ने की और संचालन रवीन्द्र के- दास ने किया। 

आरंभिक वक्तव्य शिवमंगल सिद्धांतकर ने दिया। 

फिलिस्तीनी जनता के साथ अंतर्राष्ट्रीय एकता दिवस पर कॉमरेड विनीत तिवारी द्वारा तैयार प्रस्ताव का पाठ आनंद स्वरूप वर्मा ने किया। अंतर्राष्ट्रीय एकता दिवस पर पारित प्रस्ताव में फिलिस्तीनी जनता के न्यायपूर्ण संघर्ष में उनका साथ देने का संकल्प व्यक्त करते हुए ‘दुनिया के तमाम मुल्कों में रह रही अमन और इंसाफ पसंद जनता से, इन मुल्कों की सरकारों से और खुद अपने देश की सरकार से अपील की गयी कि फिलिस्तीनियों के अपने हक की लड़ाई में उनका साथ दें और इज़रायल द्वारा किये जा रहे अमानवीय और बर्बर व्यवहार की निंदा करें।’ कवि कुमार अंबुज ने फिलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश की एक कविता का पाठ किया। 

अपने आरंभिक वक्तव्य में शिवमंगल सिद्धांतकर ने ‘अंधेरे के विरुद्ध’ कविता पाठ का महत्व रेखांकित करते हुए कहा कि कविता मानवता के कुछेक पर्यायों में से एक है। इसलिए नए फासीवादी अंधेरे के विरुद्ध मानवता के पक्ष में कविता को खड़ा होना होगा। उन्होंने मार्क्स के कथन ‘कविता मनुष्यता की मातृभाषा है’ का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘‘इसीलिए मनुष्यता विरोधी फासीवादी शोषण और दमनकारी अंधेरे के खिलाफ कविता को खड़ा होना होगा। अंधेरे द्वारा पैदा अनेक प्रश्नों का जवाब कोई दर्शन या सिद्धांत दे अथवा न दे किन्तु हर प्रश्न का उत्तर कविता देगी इसलिए कविता को अंधेरे के खिलाफ खड़ा होना होगा। उन्होंने कहा कि आज का नया फासीवाद हिटलर और मुसोलिनी वाला फासीवाद नहीं है, वह विनाशकारी पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के चरम की कोख से पैदा हो रहा है इसलिए हमारी कविता को साम्राज्यवाद के नये युग के चरम के खिलाफ खड़ा होना होगा। इसी उद्देश्य से हमने नव सर्वहारा सांस्कृतिक मंच की ओर से ‘अंधेरे के विरुद्ध’ कविता पाठ का सिलसिला शुरू किया है। हम इस संघर्ष में पुराने शस्त्रगार से प्रासंगिक औजार भी लेंगे और नये औजारों का निर्माण भी करेंगे जिसे किसी गुप्त प्रयोगशाला में निर्मित करने की बजाय खुले तौर पर हम संघर्ष के मैदान में निर्मित करेंगे जो अंधेरे को चीर कर नयी राह बनायेगी। जनतंत्र के नाम पर जिस तरह से सत्ता और संस्कृति पर कब्जा अंधेरी ताकतों द्वारा किया जा रहा है उसमें निश्चित तौर पर विपरीतों का सामंजस्य दिखलाने की कोशिश की जा रही है किंतु सर्वहारा और नव सर्वहारा जनवाद इस सामंजस्य को अंतर्विरोधों के औजार से नेस्तनाबूद करेगा; मौजूदा नई सत्ता जिनके बल पर टिकी हुई है वही उसे उखाड़ फेंकेंगे जिसमें मानवीय आरै मनुष्यता की पक्षधर कविताएं आजै शर बनेंगी और नए फासीवादी शोषणकारी और दमनकारी सत्ता को उलटकर नई सर्वहारा सत्ता के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगी। आप जानते हैं कि सभी वर्ग अलग-अलग अपनी मुक्ति चाहते हैं किंतु सर्वहारा सभी वर्गों की मुक्ति को सुनिश्चित करता है जिसे हमारी कविताएं उजागर करेंगी। इन्हीं शब्दों के साथ मैं संगठन की ओर से इस सिलसिले को जारी रखने का संकल्प दुहराता हूं।’’ 

लगभग एक घंटे तक कवि कुमार अंबुज ने अपनी अनेक चर्चित कविताओं और कुछ हाल की लिखी नयी कविताओं का पाठ किया। 

काव्यपाठ के बाद कवि के साथ कविता पर जीवंत चर्चा हुई।

अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रोफेसर कर्ण सिंह चौहान ने कुमार अंबुज की कविताओं पर बोलते हुए कहा कि रचना में अप्रत्याशित होना आवश्यक है और कुमार अंबुज की कविताओं में अप्रत्याशित चीजें हैं। ऐसा दुहराव इनकी कविता में नहीं है जिसको एक बार पढ़ कर, सुनकर ये धारणा बन जाये कि इस कवि का दायरा ये है रचनात्मकता में, विषय में, शैली में। 

आज के सहित्यिक-सामाजिक हालात पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि कविता को लेकर सवाल अक्सर उठते रहते हैं। ये कहना मुझे कभी सत्य नहीं लगा कि अच्छी कविता की जगह समाज में कम हुई है। कविता की जगह समाज में कम नहीं हुई है। पाठकों का दायरा बढ़ा है, घटा नहीं है। हुआ ये है कि हमने अपना दायरा संकुचित कर लिया है। पाठकों के मन में कवि के लिए जिज्ञासा कम हुई है ऐसा मुझे नहीं लगता है। बार-बार कहा जाता है कि अच्छी आलोचना नहीं हो रही है। ऐसा नहीं है। आलोचना नहीं होती तो मंचीय कविता और इस कविता का फर्क कौन करता। आलोचना है तभी मंचीय कविता और इस कविता में फर्क मौजूद है। तमाम लोकप्रियता के बावजूद मंचीय कविता इस कविता को स्थानापन्न नहीं कर पाई है। 

कविता और साहित्य में आ रहे नये विमर्शों पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि इस देश में जन्म से ही कई तरह के फायदे व्यक्तियों और कवियों को हो जाते हैं। उच्च कुल में पैदा होने, मानव योनि में पैदा होना और मानव में भी पुरुष होना। ये फायदे हैं जो जन्म से हो जाते हैं। लेकिन समय चीजों को तय करता है। केवल कवि ही चीजों को तय नहीं करते हैं। समय के अनुसार समाज में साहित्य का मुहावरा बदला है। समय के मुहावरे के कारण भी बहुत सी चीजें सामने आती हैं। आज मुहावरा बदल चुका है। आज विमर्शों का जमाना है, अस्मिताओं का जमाना है, आज आधुनिक विचारों- चाहे वो मार्क्सवाद का विचार हो, मनोविज्ञान का विचार हो, समाज शास्त्र का विचार हो, इन विचारों को अस्मिताओं ने स्थानापन्न कर दिया है। 

उन्होंने कहा कि नई नई अस्मिताएं आ रही हैं और बहुत सी आने को बेताब हैं। ये अस्मितायें पूरे के पूरे दृष्टिकोण और साहित्य को पुनर्परिभाषित कर रही हैं। एक जमाने में अनुभव की प्रामाणिकता का सवाल मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के बीच से उठा था। लेकिन आज अस्मिताओं ने इस पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। नारी की पीड़ा को आप सहानुभूति दे सकते हैं, संवेदनशील तो हो सकते हैं, हमसफर तो हो सकते हैं लेकिन बिना नारी हुए नारी की पीड़ा को आप नहीं समझ सकते। नारी के द्वारा आने वाली रचनाओं में हो सकता है कि उतना ज्यादा काव्य कौशल न दिखाई दे मगर इन्होंने अपनी जगह बना ली है। कई लोग कहते हैं कि समाजवाद का पराभव हुआ है जिसके कारण कविता में ऐसी चीजें हो रही हैं। मार्क्सवाद से हम अद्भुत चीजें कर सकते थे लेकिन हम मार्क्सवाद को लेकर बैठ गये। समाजवाद का पराभव अगर नहीं हुआ होता तब भी ये चीजें आतीं। मार्क्सवाद कोई केंद्रीय विमर्श में रहने वाली चीज नहीं थी क्योंकि मार्क्सवाद आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से पैदा हुई चीज है जो अस्मिताओं के इस दौर में हाशिये पर चले गये हैं। यह खाली जगहों को समझने की चीज है जिन्हें ये आधुनिक विचार नहीं समझ पाये। 

उन्होंने कहा कि कवि में हेकड़ी अगर रहती और रहे तो कविता होती है। दिक्कत ये है कि कविता एक एक्सट्रा करिकुलर ऐक्टिविटी की तरह हो गयी है। कविता पार्ट टाइम जॉब की तरह हो गयी है। हम कहते कुछ हैं और लिखते कुछ हैं। आज की कविताएं अपने से लड़ने वाली कवितायें है। यह अपराधबोध से पैदा होने वाली कवितायें हैं क्योंकि समाज में मनुष्य के खिलाफ होने वाले अपराधों में हम कहीं न कहीं शामिल हैं। सकारात्मक बोध से उपजी कवितायें नहीं हैं। हमारे व्यवहार में और हमारे विचारों में फर्क है। हम पूंजीवाद को बढ़ावा दे रहे हैं और पूंजीवाद के खिलाफ कवितायें लिख रहे हैं। आते हुए फासीवाद के लिए जिम्मेदार हम हैं, हमारा व्यवहार इसके लिए जिम्मेदार है। अपनी जड़ता को हम अपनी प्रतिबद्धता माने हुए हैं। अब आत्मालोचना करने की आवश्यकता है। हिन्दी भाषा में विमर्श की गुंजाइश नहीं बनी है। हम थोड़े अंधविश्वासी हैं। ये अंधविश्वास केवल भाजपा, आर एस एस, दक्षिणपंथी और भक्त लोगों का नहीं है। हम भी तुलनात्मक रूप से उतने ही अंधविश्वासी और स्वार्थी हैं। अब चीजों पर पुनर्विवेचन करने की जरूरत है।
इस अवसर पर प्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल, पंकज सिंह, सुरेश सलिल, सुमन केशरी, मदन कश्यप, मुकेश मानस, विनीत तिवारी, पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी, शम्भू यादव, अंजू शर्मा, सरिता दास, नित्यानन्द गायेन, आशीष मिश्र, सुलोचना वर्मा, नरेंद्र, विनोद पराशर, रवीन्द्र प्रताप सिंह आदि समेत कई महत्वपूर्ण लोग उपस्थित थे।

रिपोर्ट: नित्यानन्द गायेन और मुकेश मानस / चित्र : राजीव तनेजा



कुमार अंबुज की कुछ कविताएं

क्रूरता

धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगा
प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी
झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा
क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा
एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग
पराजित न होने के लिए नहीं
अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे
तब आएगी क्रूरता
पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी
फिर घटित होगी धर्म-ग्रंथों की व्याख्या में
फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
निरर्थक हो जाएगा विलाप
दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आंसू
पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा
तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को
फिर वह चेहरे पर भी दीखेगी
लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी
सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे
सब अपनी अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता
और सभी में गौरव भाव होगा
वह संस्कृति की तरह आएगी उसका कोई विरोधी न होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी कि किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो
वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी
और सोख लेगी हमारी सारी करुणा
हमारा सारा श्रृंगार
यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना।

किवाड़

ये सिर्फ किवाड़ नहीं हैं
जब ये हिलते हैं
मां हिल जाती है
और चौकस आंखों से
देखती है-‘क्या हुआ?’
मोटी सांकल की
चार कड़ियों में
एक पूरी उमर और स्मृतियां
बंधी हुई हैं
जब सांकल बजती है
बहुत कुछ बज जाता है घर में
इन किवाड़ों पर
चंदा सूरज
और नाग देवता बने हैं
एक विश्वास और सुरक्षा
खुदी हुई है इन पर
इन्हें देखकर हमें
पिता की याद आती है
भैया जब इन्हें
बदलवाने को कहते हैं
मां दहल जाती है
और कई रातों तक पिता
उसके सपनों में आते हैं
ये पुराने हैं लेकिन कमजोर नहीं
इनके दोलन में एक वजनदारी है
ये जब खुलते हैं
एक पूरी दुनिया हमारी तरफ खुलती है
जब ये नहीं होंगे
घर
घर नहीं रहेगा।

तुम्हारी जाति क्या है?

तुम्हारी जाति क्या है कुमार अंबुज?
तुम किस-किस के हाथ का खाना
खा सकते हो
और पी सकते हो किसके हाथ का पानी
चुनाव में देते हो किस समुदाय को वोट
ऑफिस में किस जाति से पुकारते हैं
लोग तुम्हें
जन्मपत्री में लिखा है कौन-सा गोत्र
और कहां ब्याही जाती हैं
तुम्हारे घर की बहन-बेटियां
बताओ अपने धर्म
और वंशावली के बारे में
किस मस्जिद किस मंदिर किस गुरुद्वारे में
किस चर्च में करते हो तुम प्रार्थनाएं
तुम्हारी नहीं तो अपने पिता
अपने बच्चों की जाति बताओ
बताओ कुमार अंबुज
इस बार दंगों में रहोगे किस तरफ
और मारे जाओगे
किसके हाथों?

गांव की याद में एक गीत

चीटियां आओ
कतार में
दहलीज से गुजरो
मुंह में अन्न दबाओ!
गाय आओ
अलस्सुबह रंभाओ
लिपे ओसारे में
लार टपकाओ!
कुत्ता आओ
पंजों से
अपनी रोटी के लिए
किवाड़ बजाओ!
कौआ आओ
सुबह की धूप में
घर की फुनगी पर
पंख खुजलाओ!
पीपल आओ
दुपहरी में
पत्ते हरे-पीले
आंगन में गिराओ
बच्चो आओ
नाक पोंछते
दौड़ गली में
शोर गुंजाओ!

खाना बनातीं स्त्रियां

जब वे बुलबुल थीं उन्होंने खाना बनाया
फिर हिरणी होकर
फिर फूलों की डाली होकर
जब नन्ही दूब भी झूम रही थी हवाओं के साथ
जब सब तरफ फैली हुई थी कुनकुनी धूप
उन्होंने अपने सपनों को गूंधा
हृदयाकाश के तारे तोड़कर डाले
भीतर की कलियों का रस मिलाया
लेकिन आखिर में उन्हें सुनाई दी
थाली फेंकने की आवाज
आपने उन्हें सुंदर कहा तो उन्होंने खाना बनाया
और डायन कहा तब भी
उन्होंने बच्चे को गर्भ में रखकर खाना बनाया
फिर बच्चे को गोद में लेकर
उन्होंने अपने सपनों के ठीक बीच में खाना बनाया
तुम्हारे सपनों में भी वे बनाती रहीं खाना
पहले तन्वंगी थीं तो खाना बनाया
फिर बेडौल होकर
वे समुद्रों से नहाकर लौटीं तो खाना बनाया
सितारों को छूकर आईं तब भी
उन्होंने कई बार सिर्फ एक आलू एक प्याज से
खाना बनाया
और कितनी ही बार सिर्फ अपने सब्र से
दुखती कमर में, चढ़ते बुखार में
बाहर के तूफान में
भीतर की बाढ़ में उन्होंने खाना बनाया
फिर वात्सल्य में भरकर
उन्होंने उमगकर खाना बनाया
आपने उनसे आधी रात में खाना बनवाया
बीस आदमियों का खाना बनवाया
ज्ञात-अज्ञात स्त्रियों का उदाहरण
पेश करते हुए खाना बनवाया
कई बार आंखें दिखाकर
कई बार लात लगाकर
और फिर स्त्रियोचित ठहराकर
आप चीखे-उफ, इतना नमक
और भूल गए उन आंसुओं को
जो जमीन पर गिरने से पहले
गिरते रहे तश्तरियों में, कटोरियों में
कभी उनका पूरा सप्ताह इस खुशी में गुजर गया
कि पिछले बुधवार बिना चीखे-चिल्लाए
खा लिया गया था खाना
कि परसों दो बार वाह-वाह मिली
उस अतिथि का शुक्रिया
जिसने भरपेट खाया और धन्यवाद दिया
और उसका भी जिसने अभिनय के साथ ही सही
हाथ में कौर लेते ही तारीफ की
वे क्लर्क हुईं, अफसर हुईं
उन्होंने फर्राटेदार दौड़ लगाई और सितार बजाया
लेकिन हर बार उनके सामने रख दी गई एक ही कसौटी
अब वे थकान की चट्टान पर पीस रही हैं चटनी
रात की चढ़ाई पर बेल रही हैं रोटियां
उनके गले से, पीठ से
उनके अंधेरों से रिस रहा है पसीना
रेले बह निकले हैं पिंडलियों तक
और वे कह रही हैं यह रोटी लो
यह गरम है
उन्हें सुबह की नींद में खाना बनाना पड़ा
फिर दोपहर की नींद में
फिर रात की नींद में
और फिर नींद की नींद में उन्होंने खाना बनाया
उनके तलुओं में जमा हो गया है खून
झुकने लगी है रीढ़
घुटनों पर दस्तक दे रहा है गठिया
आपने शायद ध्यान नहीं दिया है
पिछले कई दिनों से उन्होंने
बैठकर खाना बनाना शुरू कर दिया है
हालांकि उनसे ठीक तरह से बैठा भी नहीं जाता है।